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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

कनक आंटी (KANAK AUNTY) HINDI HORROR STORY




मेरी मम्मी अक्सर मुझे अपनी और उनकी दोस्त कनक की कहानी सुनाती हैं। ये कहानी मैं इतनी बार सुन चुका हूँ की मैं अब मम्मी की उन दोस्त को कनक आंटी बुलाने लगा हूँ। ये एक ऐसी कहानी है जिसके बारे में सोचकर आज भी मेरा सर चकरा जाता है।
 
चलिए ये कहानी मैं आपको अपनी मम्मी की ज़ुबानी सुनाता हूँ। 

वो बताती हैं -

कनक सिर्फ़ मेरी रूममेट ही नहीं, बल्कि सबसे अच्छी दोस्त भी थी।

पूरे हॉस्टल में हम दोनों की जोड़ी मशहूर थी। क्लासेस, लेक्चर्स और लैब के बीच भी हम दोनों अपने बाक़ी दोस्तों और हॉस्टल के स्टाफ़ के साथ प्रैंक्स करने का वक्त निकल ही लेते थे। ज़िंदगी जैसे किसी खूबसूरत सपने की तरह चल रही थी। 

और फिर एक दिन वही हुआ, जो सभी सपनों के साथ होता है। 

कनक को अपने भाई की शादी के लिए अपने शहर जाना पड़ा। मैं जानती थी की कनक के घरवाले उसके भाई के साथ उसकी भी शादी करवाने के लिए मरे जा रहे थे।

वापस आएगी भी या शादी करके वहीं से निकल लेगी?” मैंने मज़ाक़ में पूछा।

इसपर कनक ने मेरे गले में बाँहें डालते हुए वही कहा, जो वो अक्सर कहा करती थी,
मैं तुझसे दूर नहीं रह सकती मेरी जान।

हम दोनों खूब हंसे और अगले दिन कनक हॉस्टल छोड़ कर चली गयी।

पर वो क्या गयी, मेरी और सारे हॉस्टल की रौनक़ भी चली गयी। हॉस्टल भी वही था, और लोग भी लेकिन अब किसी का मन लगता ही नहीं था। इसी बहाने मैंने कुछ दिन पढ़ाई में ध्यान भी लगा लिया था। लेकिन हम सब कनक को मिस कर रहे थे। हमारी जान कनक नाम के उस तोते में बसी थी।

दिन बीतते गए और मैं पागलों की तरह कनक के वापिस आने का इंतज़ार करने लगी। उसने मुझे बताया था कि 25 तारीख़ तक वो हर हाल में हॉस्टल में वापिस जाएगी। कनक हमेशा मुझे बताती थी की उसे हॉस्टल अपने घर से कहीं ज़्यादा पसंद है। शायद इसकी वजह उसके परिवार वाले थे जो हर वक्त उसकी शादी के पीछे पड़े रहते थे।

25 तारीख़ आयी और चली गयी, लेकिन कनक का कहीं नामोनिशान नहीं था। 
एक दिन बीता, फिर दो, और फिर तीन, लेकिन कनक नहीं आयी।

पर एक शाम जब मैं लैब से वापस अपने रूम में पहुँची तो मैंने देखा कनक हमारे रूम में कुछ ढूँढ रही थी। 

कनकमैंने ख़ुशी से चिल्लाते हुए बोला तो उसने पीछे मुड़कर मुझे देखा। 

मैं बहुत खुश थी। कितनी सारी बातें उसे बतानी थीं। लेकिन कनक की आँखों में कुछ ऐसा था, जो मुझे समझ नहीं रहा था। एक उदासी, मानो उसे अंदर से खाए जा रही थी। मैं उसे गले लगने के लिए आगे बढ़ी ही थी की इतने में कनक तेज़ी से रूम से बाहर निकल गयी। उसके मुँह से मैंने सिर्फ़ इतना ही सुना, “क्यूँ?”

कनक वापस चुकी थी, लेकिन वो पूरी तरह से बदल गयी थी। मुझे लगा शायद घर पे कुछ हुआ है। मैंने एक दो बार पूछने की कोशिश भी की, लेकिन वो जवाब देने की बजाय रोना शुरू कर देती। अब कनक किसी से बात नहीं करती। वो बस चुपचाप अपने रूम में रहती और फिर अचानक ना जाने कहाँ चली जाती। क्लासेस और लैब में कनक के नाम के आगे रेजिस्टर में ऐब्सेंट लगा रहता। 

एक दिन हमारी वॉर्डन मिसेज़ शर्मा ने कनक से बात करने की कोशिश की तो इसपर कनक ऐसी भड़की की पूरा हॉस्टल हैरान रह गया।

मुझे पक्का यक़ीन था की हो ना हो, ये सब उसके घर की वजह से हो रहा था। मैंने उस रात कनक से एक बार फिर बात करने की कोशिश की। मेरा भी सब्र अब जवाब देने लगा था। 

और उसी गरमा गर्मी में मैंने कनक से कह दिया
या तो अपना ढंग बदल लो, नहीं तो अपना कमरा।

ये बात सुनकर कनक चुपचाप मेरी तरफ़ देखने लगी। उसके मुँह से निकला,
मैं सिर्फ़ तेरे लिए यहाँ आयी हूँ। और तू भी मुझसे ऐसे बात करेगी?”

मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया और कमरे से बाहर चली गयी। मैं मेस में बैठी खाना खा रही थी की तभी बाहर से चीखने की आवाज़ें आने लगीं। मैं दौड़कर बाहर गयी तो देखा हॉस्टल के नीचे सभी लोग जमा थे, और ऊपर छत की तरफ़ देख कर चिल्ला रहे थे।

मैंने ऊपर देखा तो मुझे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हुआ। कनक हॉस्टल की छत के किनारे पर खड़ी हुई थी। मुझे मानो लकवा मार चुका था। मैं खड़ी हुई कनक को एकटक देखे जा रही थी। इतने में रीमा ने धक्का मार कर मुझे चेताया, “कुछ कर! वो तेरी बात मानेगी।

कनकमैं चीखी। लेकिन हॉस्टल की छत काफ़ी ऊँचायी पर थी। मैं समझ गयी थी की मेरी आवाज़ उस तक नहीं जाने वाली थी। मैं वहाँ से जितनी तेज़ी से हो सका दौड़ गयी।

हॉस्टल के बरामदे से होकर मैंने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं। और भागते भागते मैं छत के दरवाज़े तक पहुँच गयी। लेकिन ये क्या, दरवाज़ा तो मेरी तरफ़ से बंद था। लेकिन मेरे पास ये सब सोचने के लिए वक्त नहीं था। मैंने साँकल खोली और सीधी छत के उस किनारे की तरफ़ भागी कहाँ कनक खड़ी थी। लेकिन वहाँ का नज़र देख कर मेरा दिल धड़कना भूल गया।

कनक वहाँ नहीं थी।

मेरे पैर काँप रहे थे और आंसू आँखें फाड़ कर बाहर आना चाह रहे थे। मैं डरते डरते काँपते पैरों से छत के किनारे तक पहुँची और हिम्मत करके नीचे देखा। 

लेकिन नीचे सिर्फ़ भीड़ दिखायी दी। कनक का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था।
मैंने काफ़ी देर तक उसे छत और हॉस्टल में ढूँढा, लेकिन वो कहीं नहीं थी।

नीचे से देखने वालों ने मुझे बताया की जब मैं छत पे जाने के लिए भागी थी, तब कनक चुपचाप किनारे से पीछे हट गयी थी। लेकिन उसके बाद वो कहाँ गयी? कोई नहीं जानता।

उस रात के बाद कनक फिर से ग़ायब हो गयी। हम सब सोच ही रहे थे की उसके घरवालों से बात करें की दो दिन बाद हॉस्टल के अंदर एक जीप दाखिल हुई। जीप के अंदर से कुछ लोग उतरे। मैं उन्हें पहचानती थी। ये कनक के घरवाले थे। शायद वॉर्डन ने उन्हें पहले ही खबर दे दी थी। 

मैं भाग कर उसकी मम्मी के पास गयी और उनसे पूछा की आख़िर घर पे क्या बात हुई जो कनक हॉस्टल वापस आने के बाद पूरी तरह से बदल गयी? मेरा इतना कहना था की कनक की मम्मी के पैरों के नीचे से ज़मीन उखड़ गयी। कनक के भाई ने उन्हें सम्भालते हुए मुझसे जो कहा, वो आज भी मुझे सिहरन दे जाता है। उन्होंने मुझे बताया की कनक शादी से कभी वापस आयी ही नहीं आयी। हॉस्टल वापस आते वक्त उसकी बस का ऐक्सिडेंट हो गया था, जिसमें उसकी मौत हो गयी। वो लोग हॉस्टल से कनक का सामान लेने आए थे।

मैं एकटक कनक के भाई के चेहरे को देखे जा रही थी। मैंने उन्हें बताना चाहा की कनक दो दिन पहले तक इस हॉस्टल में हमारे साथ थी। और उसे सिर्फ़ मैंने नहीं बल्कि सभी लोगों ने देखा था। लेकिन पता नहीं क्या सोचकर मैं चुप रह गयी।

उस दिन के बाद से कनक फिर हॉस्टल में वापस नहीं आयी। उसके घरवालों ने उसका सामान लिया और लौट गए। मैंने भी उस दिन के बाद कभी उनसे बात करने की भी कोशिश नहीं की।


ये कहानी मैंने अपनी मम्मी से कई बार सुनी है। लेकिन कल सफ़ाई करते वक्त जब उन्होंने एक पुरानी धूल से सनी फ़ोटो ऐल्बम मुझे दिखायी जिसमें मम्मी और कनक आंटी के हॉस्टल के समय के कुछ फोटो थे। मैंने जैसे ही कनक आंटी के फ़ोटो देखे, मेरा दिमाग़ पूरी तरह से हिल गया।

हमारे घर के सामने वाले पार्क के बाहर पेड़ के नीचे एक बेंच है। 
इस बेंच पर अक्सर कुछ प्रेमी युगल या थके माँदे अधेड़ उमर के लोग आराम करते दिख जाते हैं। उसी बेंच पर मैंने अक्सर एक लड़की को बैठे देखा है। वो शाम ढलने के वक्त बेंच पर आकर बैठ जाती है, और चुपचाप हमारे घर को घूरती रहती है। मानो उसे किसी का इंतज़ार हो। 

मैंने मम्मी को ये बात नहीं बतायी, लेकिन मैंने कनक आंटी को कई बार देखा है। उस बेंच पर बैठ कर हमारे घर की तरफ़ देखते हुए। और ऐसे में मुझे कनक आंटी के वो शब्द याद गए जो वो अक्सर मेरी मम्मी से कहती थीं, 
 
“मैं तुझसे दूर नहीं रह सकती मेरी जान।”




Hindi Horror Story Kanak Aunty


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