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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

कर्ण-पिशाचिनी (KARN PISHACHINI) HINDI HORROR STORY



मामा जी के दिन अचानक ही फिर गए थे। वो परिवार जिसके पास बिजली के बिल भरने के पैसे भी जैसे तैसे पूरे होते थे, उनके यहाँ अब हर रोज़ नए TV और AC, जैसी चीजें आने लगीं थीं। मोहल्ले का हर इंसान इस कायापलट से भौचक्का था, सबके बीच बस एक ही बात रहती की आख़िर मेरे मामा जी के हाथ ऐसी कौनसी लॉटरी लग गयी?
और एक दिन मामा जी ने मेरी मम्मी को इसका राज़ बता ही दिया।
मामा जी बचपन से ही काफ़ी धार्मिक थे। और बड़े होने पर ज्योतिष से शुरू हुआ ये शौक़ तंत्र मंत्र और साधनाओं के ज्ञान-अर्जन में बदल गया। और इसी फ़ितूर के चलते एक दिन मामा जी ने एक कर्ण-पिशाचनी को साध लिया था। 

कर्ण-पिशाचनी दरसल एक सिद्धि है। ये जिस भी इंसान से खुश हो जाए, उसके साथ आकर रहने लगती है। इस से पूछे गए किसी भी सवाल का जवाब कर्ण-पिशाचनी अपने साधक के कान में फुसफुसा कर दे देती है। इसीलिए इसे कर्ण-पिशाचनी कहा जाता है।

इसे सिद्ध करना हर एक के बसकी बात नहीं होती। कर्ण-पिशाचनी एक तामसी सिद्धि है जो काले जादू और अघोरी पंत वाले साधक ही साध सकते हैं। कर्ण-पिशाचनी को साधने वाले इंसान को महीनों तक अकेले एक बहुत जटिल साधना करनी पड़ती है। जिसमें नहाना धोना निषेध होता है। साधक को कच्चे मांस के साथ ढेर सारी शराब पीनी पड़ती है और साधना करते हुए इसी तरह का जीवन तब तक जीना होता है जब तक कर्ण-पिशाचनी उससे खुश नहीं हो जाती।

लेकिन मेरे मामा जी ने ये कमाल कर दिखाया था। उनके पास अब एक कर्ण-पिशाचनी थी। जो किसी भी सवाल का जवाब उन्हें दे सकती थी। पहले तो मामा जी उस कर्ण-पिशाचनी से सिर्फ़ अगले दिन लगने वाली लॉटरी और सट्टे के नम्बर ही पूछते थे। पर धीरे धीरे मामा जी का लालच बढ़ता गया, और उनके घर पैसों की मानो बारिश होने लगी। 

और जब कर्ण-पिशाचनी वाली बात लोगों में फैलने लगी, तो सबसे पहले इसका फ़ायदा मामा जी के पड़ोसियों ने ही उठाया। उनके आस पास के लोग, जो उनकी सफलता से जलने लगे थे अब उनके पास अपना भविष्य पता करने आते। और मामा जी की बतायी सभी बातें हमेशा सच निकलतीं। मामा जी का नाम फैलने लगा था और दूर दूर से लोग उनके पास आते। 

फिर एक वक्त ऐसा आया जब मामा जी के घर के बाहर रोज़ बड़ी और महंगी गाड़ियाँ दिखाए देने लगीं। वो अब एक जाने माने ज्योतिषी बन चुके थे। देखते ही देखते उनका दो कमरों का घर एक तीन मंज़िल की कोठी बन गया।

लेकिन फिर वही हुआ, जैसा इन क़िस्सों में अक्सर सुनने को मिलता है।
एक दिन मामा जी की कर्ण-पिशाचनी उनसे नाराज़ हो गयी।

मामा जी मानो पागल होने लगे थे। वो अपने आप से बातें करते रहते, और रात रात भर चीखते रहते, मानो किसी से चुप होने के लिए गिड़गिड़ा रहे हों। पूरे दिन वो अपने कानों में रुई या उँगली डाले रहते, जैसे बहरे हो जाना चाहते हों। उनका ये पागलपन बढ़ता जा रहा था और एक दिन हम सबने देखा की उनके कानों से खून बहना शुरू हो चुका था।

कर्ण-पिशाचनी अब मामा जी के कान में पूरे दिन और पूरी रात बिना रुके चीखती रहती।

हमने मामा जी को ना जाने कितने डॉक्टर, वैध, और सायकॉलिजस्ट को भी दिखाया लेकिन उनकी बीमारी किसी की पकड़ में नहीं आयी। पंडितों, ओझाओं और तांत्रिकों ने कुछ शुरुआती प्रयोगों के बाद मामा जी से मिलने से भी इनकार कर दिया। मामा जी और उनका परिवार अब उस कर्ण-पिशाचनी की दया पर थे।

एक कर्ण-पिशाचनी को खुश रखना उसे सिद्ध करने से भी ज़्यादा मुश्किल होता है। कर्ण-पिशाचनी को रोज़ शराब चाहिए होती है। इसीलिए उसका साधक एक alcoholic भी बन जाता है। उसके अलावा कर्ण-पिशाचनी अपने साधक को किसी भी और औरत के साथ बर्दाश्त नहीं कर सकती, फिर चाहें वो माँ, बहन, या पत्नी ही क्यूँ ना हो। और मामा जी के तो 2 बेटियाँ थीं।

वैसे तो साधना के समय से ही मामा जी ने मामी जी और अपने परिवार से दूरी बना ली थी। कर्ण-पिशाचनी सिद्ध होने के बाद वे मामी जी के साथ ना रहते और ना ही सोते। और घर बड़ा होने के बाद मामा जी ने अपने लिए एक अलग कमरा ही तैयार करवा लिया था जिसमें किसी का भी जाना माना था। 

कर्ण-पिशाचनी के नाराज़ होने से पहले ही मामी जी अपना पति और उनकी बेटियाँ अपना पिता खो चुकी थीं। लेकिन अब मामा जी की हालत दिन दिन ख़राब होती जा रही थी। मामा जी रोज़ अपने कमरे में शराब पीते, और फिर ज़ोर ज़ोर से चीखते जैसे किसी से लड़ रहे हों। सुबह नशा उतरने के बाद वो भगवान के सामने हाथ जोड़े नज़र आते, “मुझे बचा लो, मुझसे गलती हो गयी।यही सब बोल बोलकर वो तब तक रोते जब तक उनके कानों से खून निकलना शुरू ना हो जाता। और उसके बाद वो फिर से पागल हो जाते। शराब के नशे में रहना ही उनकी इस बीमारी का इकलौता इलाज बन चुका था। 

जो परिवार ग़रीबी में भी खुश रहता था, अब बड़ा घर और सारी सुख सुविधाएँ होने के बाद भी अंदर से एक सड़ चुका था। 

कर्ण-पिशाचनी हर समय मामा जी के कान में चीखती। वो बताते थे की कैसे कर्ण-पिशाचनी बार बार उन्हें धमकी देती, की वो उन्हें और उनके परिवार का नाश कर देगी। वो बार बार अपनी कर्कश आवाज़ में उन्हें बताती की उनकी बेटियाँ किस तरह मरेंगी।मामा जी अपना आप खोकर कभी अपने कान बंद करते, तो कभी पागलपन में अपने बाल नोंचते।

मामी जी और उनकी बेटियों से ये सब नहीं देखा जाता। एक दिन मामी जी ने मामा जी को उन्हीं के कमरे में बंद करके बाहर से ताला लगा दिया। वो ताला सिर्फ़ उन्हें खाना देने के लिए खोला जाता। मामी जी ने ये कदम इसलिए उठाया ताकि उनकी बेटियाँ अपने पिता को इस हाल में ना देख पाएँ, लेकिन मामा जी के रोने की आवाज़ें पूरे दिन और पूरी रात आतीं।

और एक रात, उस घर में खामोशी छा गयी।

सुबह मामा जी की लाश उस कमरे में मिली। उनके कानों में स्वेटर बुनने वाली सलाइयाँ घुसी हुईं थीं। 

मामा जी को गुजरे आज एक साल हो चुका है, और उनकी आख़िरी याद में मेरे सामने वो कमरा जाता है, जिस में वो बंद थे। उनका रोना आज भी कभी कभी किसी डरावने सपने में मुझे सुनायी दे जाता है। 

मामी जी और उनकी बेटियाँ अब इस बारे में बात नहीं करते। लेकिन हम सब जानते हैं की मामा जी ने अपनी जान अपने परिवार को उस कर्ण-पिशाचनी से मुक्ति देने के लिए ली थी। आप सब शायद से सोच रहे हों की आज मैं आपको ये सब क्यूँ बता रहा हूँ?

जवाब है मेरी एक दोस्त, जो paranormal science में रिसर्च कर रही है। आजकल उसके सर पे कर्ण-पिशाचनी को साधने का भूत सवार हो गया है। 

मैं उसे काफ़ी समझा चुका हूँ। लेकिन वो अपना मन बना चुकी है।



लेखक: स्वप्निल नरेंद्र
सम्पादक: अलका मिश्रा 



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