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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

छुटकी (CHHUTKI) - HINDI HORROR STORY



उस शोरगुल और भागदौड़ से भरे हाइवे से निकलती है वो पतली सी एक सड़क। 


जो पेड़ों से भरे एक रास्ते में कहीं खो जाती है। अगर कोई भूले भटके इस रास्ते पे निकल जाए तो तक़रीबन डेढ़ या दो किलोमीटर बाद एक छोटे से बगीचे के पीछे से एक पुराना मकान झांकता दिखता है। मानो कह रहा हो, “देखो मुझे भी, मैं कब से यहाँ रह रहा हूँ।इस मकान से मिलने अब कोई नहीं आता।


लेकिन उस दिन शायद मकान भी उस लड़की को अपने सामने खड़े देख कर चौंक होगा।


अवनी, पहली बार इस मकान को देख रही थी, जिससे उसका एक खूबसूरत रिश्ता बनने वाला था। और मकान की हालत देख कर अवनी को समझ गया कि इसका किराया इतना कम क्यूँ है। आस पास ना कोई मकान, ना दुकान। लेकिन अवनी की माली हालत उस मकान की हालत से कुछ ज़्यादा अच्छी नहीं थी। नयी नौकरी, और नया शहर। घर से भी ज़्यादा पैसे मिलने की उम्मीद नहीं थी। पापा ने उसकी पढ़ाई पे इतना खर्च कर दिया वही बहुत था। वो उनपर और बोझ नहीं डालना चाहती थी। उसने सोच लिया था की नौकरी लगने के बाद जो भी ख़र्चा होगा, वो खुद करेगी। ऊपर से उसका ऑफ़िस उस हाइवे के दूसरी तरफ़ ही था। दफ़्तर आने जाने में 5 मिनट से ज़्यादा का वक्त नहीं लगने वाला था। लेकिन सबसे बड़ी बात ये थी कि ये मकान उसके पापा के दोस्त शर्मा अंकल का था। तो किराया ना देने पर भी काम चल सकता था। 


यही सोच कर अवनी ने उस मकान में रहने का फ़ैसला कर लिया था। लेकिन अवनी उस घर में अकेली नहीं थी। घर पहुँचने पर उसे मिली मकान जितनी ही बूढ़ी, आशा बुआ। जो उस घर में बचपन से रहती आयी थी। शुरू में तो अवनी को लगा की 50-55 साल की आशा बुआ क्या ही काम करती होंगी लेकिन वहाँ रहने के कुछ ही समय में अवनी को समझ गया की आशा बुआ बोलने में नहीं, काम करने में यक़ीन रखती हैं।


आशा बुआ ज़्यादा बोलती नहीं थी। बस हूँ, हाँ करके अपना काम चला लेती थीं। अवनी को भी ये बात बड़ी अच्छी लगती। आशा बुआ अपने काम से काम रखतीं, और अवनी को भी उसके हाल पे छोड़ देतीं। उन्होंने ना अवनी को अपने बारे में कुछ बताया, और ना ही उससे उसके बारे में कभी कुछ पूछा। हाँ घर की साफ़ सफ़ाई, खाना बनाने में मदद, और बाक़ी ज़रूरी कामों में पीछे ना हटतीं। उस औरत में बात समझने की मानो एक अजीब ताक़त थी। अवनी के बिना बोले, बिना बताए वो घर के छोटे मोटे काम पूरे कर देतीं। अगर अवनी सब्ज़ी काटते वक्त छिलके उठाना भूल जाती, तो एक ही पल बाद वापस आकर उसे सारी गंदगी ग़ायब मिलती। आशा बुआ अवनी की नज़रों में एक सुपर हीरो की हैसियत रखने लगीं। 


लेकिन आशा बुआ ने अवनी के सामने घर में रहने के कुछ नियम क़ायदे पहले ही रख दिए थे। जिनमें सबसे पहला क़ायदा था, कि रात होने के बाद अवनी घर से बाहर आम के बाग में नहीं जाएगी। उसके अलावा, और तो और कई बार कुछ मामूली सी बातों पर वो चुप रहने वाली वो औरत, अचानक ही अवनी पर भड़क उठती। अगर अवनी, अपना कोई सामान जैसे लैपटॉप या फ़ोन वग़ैरह अपने कमरे से बाहर छोड़ जाती, तो आशा बुआ उस पर चिल्ला उठतीं।


आशा बुआ किसी ज्वालामुखी जैसी थीं। दिखने में मज़बूत, और शांत। लेकिन जब फटतीं तो अवनी सब कुछ भूल जाती। लेकिन उनकी एक बात और अवनी को अजीब लगती। सूरज ढलने से पहले ही आशा बुआ रात का खाना खा कर अपने कमरे के अंदर खुद को बंद कर लेतीं। कभी कभी अवनी सुनती कि कैसे कई बार रात में आशा बुआ के कमरे से आवाज़ें आतीं मानो वो किसी से बातें कर रही हो। 


और अवनी अच्छी तरह जानती थी कि आशा बुआ के पास मोबाइल फ़ोन था ही नहीं। कभी कभी तो अवनी को आशा बुआ के हंसने की भी आवाज़ें आतीं। लेकिन इस बारे में कुछ पूछने की हिम्मत अवनी ने कभी नहीं की।


एक रात अवनी की आँख रात में ही खुल गयी। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। तो उसने एक कश्मकश के बीच अपना लैपटॉप निकाला। लेकिन जैसे ही अवनी ने लैपटॉप का चार्ज़र दीवार में लगाया, उसने याद आया कि उसके कमरे का प्लग पिछले कुछ दिनों से ख़राब पड़ा था। अवनी ने अपना लैपटॉप उठाया और अपने कमरे से निकल कर सीधा हॉल में जा पहुँची। वहाँ उसने लैपटॉप को चार्ज़ पर लगाया और ऑफ़िस का काम करने लगी। लेकिन तभी उसे बाहर से एक आवाज़ आयी --


अवनी को सुनायी दिया कि बाहर कोई ताली बजा रहा था।


शुरू में अवनी को लगा की ये शायद उसका वहम है। लेकिन थोड़ी देर बाद वो आवाज़ दोबारा अवनी के कान में पड़ी। और इस बार ये आवाज़ पहले से भी तेज थी। अवनी तुरंत उठी और उसने खिड़की से बाहर झांक कर देखा। बाहर रात के अंधेरे में बाग में लगे बूढ़े आम के पेड़, कभी धीमी और कभी तेज बहती हवा के साथ मानो एक अजीब सी धुन में नाच रहे थे। बाहर का खूबसूरत नजारा देख कर अवनी थोड़ी देर के लिए सब कुछ भूल गयी। ये सब देख कर उसे अपना बचपन याद गया। इंदौर का उसका वो घर जिसमें वो गर्मियों की रातों में अपनी छत से ऐसा ही कुछ नजारा देखती थी। उसके घर के बाहर कोई बाग तो नहीं था लेकिन सड़क के किनारे लगे पेड़ चाँदनी रात में हवा के साथ कुछ ऐसे ही हिलते। अवनी को पता भी नहीं चला की इस में खोयी हुई वो कब घर का दरवाज़ा खोल कर, बाहर बाग में पेड़ों के बीच पहुँच गयी। 


वो हवा अब अवनी अपने चेहरे पर महसूस कर पा रही थी। उसे समझ नहीं रहा था की आख़िर आशा बुआ उसे इस सुख से दूर क्यूँ रखना चाहती हैं। लेकिन तभी उसे याद आया की वो इंदौर नहीं, बल्कि नॉएडा में थी। और अगर आशा बुआ ने उसे उनका सबसे बड़ा क़ायदा तोड़ते देख लिया तो उसकी खैर नहीं थी। 


यही सोचकर अवनी तेज कदमों के साथ घर की तरफ़ बढ़ने लगी। लेकिन बाग के बीच में से निकलते हुए अवनी की नज़र उसके पास ही आम के पेड़ की एक टहनी पर गयी। और वहाँ जो चाँद की रोशनी में उसने देखा, उसे देखकर उसके पैर वहीं जड़ हो गए।


पेड़ की टहनी पर दो हाथ चिपके हुए थे। मानों कोई बच्चा पेड़ से लटक रहा हो, लेकिन हाथों के अलावा बाक़ी का पूरा जिस्म ग़ायब था। 


अवनी के मुँह से एक ज़ोर की चीख निकली और वो तुरंत घर की तरफ़ भागी। भागते भागते उसने पलट कर पीछे देखा - वो हाथ पेड़ छोड़ कर नीचे कूद गए। और इस तरह अपनी उँगलियों पर खड़े हो गए, मानो अवनी को ही देख रहे हों। भागती हुई अवनी पीछे देखती हुई घर की चौखट से उलझी और हॉल के फ़र्श पर फिसलती हुई सोफ़े से जा टकरायी। अवनी के ऊपर कुछ कर गिरा। 


अवनी उस चीज़ को अपने ऊपर से हटती हुई चीखती रही। लेकिन कुछ सेकंडस तक चीखने के बाद अवनी को समझ आया की ये उसका लैप्टॉप था। जो सोफ़े से टकराने के बाद उसी के ऊपर गिरा था। अवनी ने अपना लैप्टॉप उठा कर सोफ़े पर रखा और भागते हुए घर का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। और फिर खिड़की बंद करने से पहले अवनी ने एक नज़र घर के बाहर बाग में दौड़ायी। वो हाथ उसे कहीं नहीं दिखे। अवनी डरते डरते पीछे आयी और तभी उसके अपने कंधे पर कुछ महसूस हुआ।


ये एक हाथ था।


अवनी ज़ोर से फिर चीखी, लेकिन तभी उसके कानों में आशा बुआ की आवाज़ सुनायी पड़ी। उसके कंधे पर उन्हीं का हाथ था। 

क्या हो गया? तुम इतनी रात को जाग क्यूँ रही हो?” आशा बुआ ने डाँटते हुए अवनी से कहा।


अवनी की जान में जान आयी। लेकिन उसकी आवाज़ वापस आने में कुछ वक्त लगने वाला था। अवनी के मुँह से जैसे तैसे कुछ शब्द निकले, बुआ, वो वहाँ, वहाँ बाग में - वो” इसपर आशा बुआ ने उसकी बात काटते हुए एक लेक्चर पिलाया, मैंने तुम्हें कितनी बार बोला है रात में घर के बाहर और ख़ासकर के उस बाग में मत जाना। फिर क्यूँ गयीं तुम?”


अवनी के पास इस बात का जवाब नहीं था। लेकिन तभी आशा बुआ की सख़्त आवाज़ में अचानक एक नरमी आयी। शायद वो समझ गयीं थी की लड़की डर गयी थी। उन्होंने प्यार से अवनी का हाथ पकड़ते हुए कहा, चलो अपने कमरे में चलो। मैं तुम्हारे लिए गरम दूध लाती हूँ। नींद जाएगी। चलो।


आशा बुआ ने अवनी को बड़े प्यार से उसके कमरे में छोड़ा, और फिर वहाँ से रसोई की तरफ़ चली गयीं।


अवनी का डर अब काफ़ी दूर हो चुका था लेकिन उसके जिस्म में एक अजीब सी कंपकंपी चढ़ रही थी। शायद उसे बुख़ार आने वाला था। यही सोच कर उसने अपने बिस्तर में घुस कर चादर ओढ़ ली। लेकिन तभी उसकी नज़र अपने कमरे के दरवाज़े पर गयी। अवनी की कंपकंपी अचानक ही रुक गयी और एक दहशत उसके ऊपर हावी होने लगी।


सामने दरवाज़े पर वही दो हाथ खड़े थे। मानो उससे ही मिलने आए हों।




आगे क्या हुआ ?




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