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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

मेडल (MEDAL) - HINDI HORROR STORY

उस साल गर्मियों की छुट्टियाँ बस खतम ही हुईं थीं। बारिश का समय था, मैं क्लास में पढ़ा रहा था। तभी मैंने देखा की एक लम्बा सा छात्र अपने से थोड़े छोटे दूसरे छात्र से कुछ छीनने की कोशिश कर रहा है। 


मैंने उन्हें डाँटा, "क्या हो रहा है ये?" तो उन्हीं में से कोई बोल पड़ा, "सर, कामाख्या सुधीर का मेडल छीन रहा है।"


"क्या? क्या छीन रहा है?" एक बार को लगा कि मुझे ठीक से सुनाई नहीं दिया।

"मेडल सर," वो छोटा लड़का इस बार स्वयं बोल उठा, "ये कामाख्या मेरा मेडल छीन रहा है।" 

"ए कामाख्या, तुम क्यूँ सुधीर का मेडल छीन रहे हो?" मैंने डाँटते हुए पूछा। 

"छीन नहीं रहा था सर, बस देख रहा था। पर ये सुधीर दिखा दिखा ही नहीं रहा था।" कामाख्या ने सफ़ाई दी।

"अरे उसका मेडल है, अगर नहीं दिखाना चाहता तो ना सही। तुम ऐसे छीना झपटी करोगे?" मैंने थोड़ा कड़क कर कामाख्या को समझाया, "चलो बैठो, और आगे से ऐसा फिर मत करना।"

कक्षा थोड़ी ही देर के लिए सही पर शांत हो चुकी थी। अपनी बात  समाप्त करके सुधीर की ओर देखते हुए मैंने एक छोटा सा लेक्चर भी दे डाला की कैसे हम सबको भाईचारे के साथ रहना चाहिए। पर फिर कौतूहल के साथ मैंने पूछा,  "ये मेडल का क्या मामला है? सुधीर दिखाओ ज़रा अपना मेडल।"


मैंने सोचा था कि आजकल कलकत्ता के मौहल्ले-मौहल्ले में जो बैडमिंटन, तैराकी या दौड़ की प्रतियोगिताएँ होती रहती हैं, उन्हीं में से किसी में शायद चौथे पाँचवें स्थान पर आकर, छोटा मोटा अठन्नी बराबर मेडल पा गया होगा, और स्वाभाविक है कि वो उसे अपनी कक्षा में लाकर पाँच अन्य लोगों को दिखाना चाहेगा। यहाँ तक कि इसी बहाने पूरी कक्षा को इकट्ठा करके हेडमास्टर के पास जाकर आधे दिन की छुट्टी की माँग भी कर सकता है। 


तो वो मेडल मैंने तुच्छ भाव से हाथ में ले लिया, किंतु मेडल की ओर एक बार उपेक्षा से देखते ही, कुर्सी पर सीधा होकर बैठ गया। 


मेडल पर महारानी विक्टोरिया की काम उम्र वाली छवि अंकित थी। लिखा था VICTORIA REGINA, 1854 -- नहीं, ये मौहल्ले की प्रतियोगिता में बँटा मेडल बिलकुल नहीं था। बल्कि ये काफ़ी पुराना और भारी मेडल था। काफ़ी बहुमूल्य। 


मैंने मेडल पर एक और निगाह डाली, तो उस पर लिखा था,  क्रीमिया, सेवस्तापोल, सार्जेंट एस वी पर्किन्स, सिक्स्थ ड्रैगन गार्ड्ज़, सन 1854 


पढ़कर मैं हैरान रह गया। 


क्रीमिया के युद्ध के समय सेवस्तापोल के रणक्षेत्र में किसी साहसिक कार्य को सम्पन्न करने के लिए ये मेडल ड्रैगन गार्ड्ज़ सैन्य टुकड़ी के सार्जेंट पर्किन्स को दिया गया था।


किंतु कलकत्ता के नीलमणि दास लेन के सुधीर बाबू के पास ये मेडल कहाँ से आया?


वह मेरा मेडल है सर।सुधीर बोल पड़ा।


मैंने एक नज़र सुधीर को ऊपर से नीचे देखा, "तुम्हारा है पर है किसका? यह मेडल तुम्हारे पास कहाँ से आया?"


"यह मेडल वर्षों से हमारे परिवार में है सर।" सुधीर ने समझाया, "मेरे दादाजी के पिताजी के पास एक अंग्रेज सैनिक इसे गिरवी रख गया था। पर कभी छुड़ा नहीं पाया।"


"गिरवी?" मैंने पूछा।


"हमारी शराब की दुकान थी ना सर।" सुधीर बोला, "दादाजी बताते थे की वो अंग्रेज सैनिक बहुत शराब पीता था। एक दिन उसके पास शराब पीने के बाद पैसे कम पड़ गए तो अपना यह मेडल गिरवी रख गया।"


मैंने हिसाब लगा कर देखा, जिस वर्ष सार्जेंट पर्किन्स ने ये मेडल पाया था, तब से 86 वर्ष बीत गए थे। तब उसकी उम्र अगर 20 वर्ष की भी रही हो, तो अब वो 106 वर्ष का होना चाहिए। मतलब सार्जेंट पर्किन्स कब का मरके भूत बन कर भटक रहा होगा। मैं उस मेडल की ओर काफ़ी आकृष्ट हुआ। शनिवार का दिन था, सुबह सुबह छुट्टी होगी, और बहुत दिनों बाद गाँव जाऊँगा, पहले से निश्चित कर रखा था। वहाँ एक सम्पर्क है, गाँव के ही व्यक्ति हैं जिन्हें हम आदर से बड़े पिताजी या ताऊजी कहते हैं। वे इतिहास पे चर्चा करते रहते हैं। काफ़ी अध्ययन भी कर रखा है। सोचा, उन्हें ये मेडल दिखाऊँगा तो वे बहुत खुश होंगे। तो सुधीर से वो मेडल माँग लिया, कहा सोमवार को लौटा दूँगा।



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स्कूल से छुट्टी के बाद सियालदाह स्टेशन से अढ़ाई बजे की गाढ़ी पकड़ी। गाँव के स्टेशन पर जब उतरा तब साढ़े पाँच बज चुके थे। दो मील पैदल चलकर, घर पहुँचते पहुँचते शाम ढलने लगी। भादों महीना ख़त्म होने को था और वर्ष उतनी अधिक ना होने के कारण रास्ता सूखा था। पथ के दोनों ओर फैली वर्षा ऋतु की हरियाली आँखों को अच्छी लग रही थी। आजकल कलकत्ता में कहाँ ऐसा दृश्य देखने को मिलता है


इसीलिए ज़ोर से पाँव ना चलाकर धीरे धीरे पैदल जा रहा था। यहाँ पहले ही बता दूँ मेरे घर पर कोई नहीं रहता है। बग़ल वाले घर की एक वृद्धा मेरे जाने पर हमेशा भोजन बना दिया करती है। मेरा एक बचपन का दोस्त है वृंदावन। वो कई वर्षों से विदेश में रह रहा है। फूफी माँ के मुँह से सुना की वृंदावन कुछ पंद्रह दिन पहले घर आया है। संध्या के बाद ही उस से मिलूँगा और वो मेडल भी दिखाना है उसे।


नदी के किनारे जाकर देखा, वर्षा के कारण नदी का जल भयानक रूप से बढ़ा हुआ है। और किनारों को छोड़ कर दोनों ओर के खेतों तक जा पहुँचा है। बहुत देर तक बैठा रहा। धीरे धीरे अंधेरा होने लगा। चमगादड़ों के दल अपने अपने घरों से निकलने लगे। किसी ओर कोई नहीं। एक स्थान पर वर्षा की चोट से नदी का किनारा टूट गया है। बहुत अधिक ऊँचा किनारा और नीचे तेज बहती नदी।


उस जगह से जाते जाते इच्छा हुआ की देखूँ की नदी ने किनारों को किस तरह तोड़ा है?


किनारे पे खड़ा होकर, मैं नीचे जल का भँवर देख ही रहा था कि, अचानक मेरे मन में एक विचित्र इच्छा जाग उठी।

मैं कूद कर किनारे से जल में जल में गिरूँगा।


खड़े खड़े इच्छा जैसे क्रमश बढ़ती जा रही थी। कूदूँ ?? कूद पड़ूँ?

मैं तैरना नहीं जानता, पर इच्छा को किसी भी तरह नहीं सम्भाल पा रहा था। 


यहाँ तक कि मेरे मन में विचार आया

और कुछ क्षणों तक रहने पर मुझे कूदना ही पड़ेगा। नहीं तो मेरे जीवन का सुख चला जाएगा।


जल्दी जल्दी किनारे से एक प्रकार से ज़ोर लगाकर लौट आया।

ये मुझे क्या हो गया था? अद्भुत!

तबियत भी तो ठीक ही थी।


वृंदावन के घर गया। कितने दिनों के बाद हम मिले। देर तक बैठ कर ढेर सारी बातें की। सुख दुःख की कहानियाँ। बहुत गर्मी है आज। कहीं भी तनिक सी हवा नहीं है। भादों महीने की उमस भारी गर्मी। वृंदावन ने कहा, “ चलो चलते हैं। छत पर बैठ कर बातें करते हैं। थोड़ी हवा तो मिलेगी। हाँ सुन, तू हमारे यहाँ से खा पीकर ही जाएगा, माँ ने कह दिया है।


दोनों जन छत पर गए। घर दो तल्ला था। दूसरे तल्ले की छत पर एक ही कमरा है। मैं जानता था वृंदावन के चाचा उस कमरे में रहते हैं। दूसरे तल्ले की छत पर जाके देखा, घर के पिछले हिस्से पर बांस का टेक लगाया गया है। मैंने कहा, “घर पर राजमिस्त्री काम कर रहा है शायद वृंदावन?”


हाँ भई, चाचा के घर की मरम्मत होगी। उत्तर की ओर की दीवार से नोन लगी ईंटों को निकाला जा रहा है।


वृंदावन दूसरे तल्ले के घर में गया। मेरे मन में किंतु ना जाने कैसा एक अस्थिर भाव था। थोड़ी देर बातें कर मैंने थोड़ा पानी पीना चाहा। वृंदावन पानी लेने नीचे गया, मैं छत पर टहलने लगा। छत पर कोई नहीं था। बिलकुल अंधेरा था। जिस ओर राजमिस्त्री बांसों का आलंब लगाए काम कर रहे हैं, टहलते टहलते उसी ओर जाकर खड़ा होकर देख रहा था। 


अचानक मेरे मन में आया, “क्यूँ ना छत पर से कूद पड़ूँ? अच्छा होगा। कूदूँगा। कूदना ही पड़ेगा। कूद पड़ूँ?”


इसी समय में वृंदावन ने छत अपर आकर कहा, “अरे सुरेन आओ, कमरे में जाओ। माँ चाय भेज रही है। अरे वहाँ क्यूँ खड़े हो?”


और भी क़रीब आधे घंटे तक बातें करने के बाद, वृंदावन खाने की व्यवस्था कहाँ तक हुई ये देखने नीचे चला गया। घर के अंदर बहुत गर्मी थी। मैं बाहर छत पर खुली हवा में फिर से टहलने लगा। राजमिस्त्रियों के बेड़े के निकट जाकर मेरे मन में आया, “कूदना तो इस बार पड़ेगा ही। कोई नहीं है छत पर कोई रोकने नहीं आएगा। अवसर उपयुक्त है।” 


संग संग, मेरे मन के भीतर से जैसे कोई ये भी कह रहा है

कूदना मत मूर्ख। कूदना मत। गिरकर चूर चूर हो जाओगे।


मेरे सिर में ना जाने कैसी झनझनाहट सी हो रही है।


कितने क्षणों बाद, ये नहीं जानता और कैसे हुआ ये भी नहीं जानता। अचानक, वृंदावन की चीख से मुझे होश आया, “, ये क्या कर रहे थे?”


देखा, वृंदावन मेरा हाथ खींच के मुझे उठा रहा है।


तेरी तबियत तो ठीक है ना? मैंने देखा तुम जैसे कूद पड़े थे।भाग्य से पाँव बांसों में अटक गए, इसी से रक्षा हुई। क्या हुआ है तुझे? सुरेन!”


वृंदावन ने मुझे घर में ले जाकर सुला दिया। सभी ने कहा ट्रेन से आने के कारण और गर्मी से तबियत से ख़राब होने के कारण सर चकराने से मैं गिर पड़ा था। मैं जानता हूँ, सिर चकराने के कारण मैं नहीं गिरा था। मैं स्वेच्छा से ही कूद पड़ा था। बिछौने पर सोकर बहुत स्वस्थ महसूस किया। करवट बदलते ही लगा जैसे कोई कड़ी वस्तु मेरी छाती से टकराई। पॉकेट में हाथ डालकर पाया, सुधीर का वही मेडल था। 


आश्चर्य। इसकी बात तो अब तक एकदम भूल गया था। वृंदावन को दिखाया उसे। उसके घर के सभी लोगों ने हाथों में मेडल को घुमा फिरा कर देखा। रात को अपने घर आकर में सो गया।


जैसा मैंने कहा था कि मैं अकेला ही रहता हूँ। एक बात समझ आयी कि जबसे वृंदावन के घर से बाहर निकल कर रास्ते पर पैर रखा है तबसे ही मुझे ना जाने किस प्रकार का डर लग रहा है। घर में जब प्रवेश किया, तब जैसे सर बढ़ गया। इसके पहले घर में कितनी ही बार अकेले सोया। कभी मन में ऐसा डर नहीं आया। ना, मैं सचमुच ही बीमार हूँ। शरीर बीमार रहने पर मन का भी दुर्बल होना बहुत स्वाभाविक है। 


बत्ती बुझाकर मैंने सोना चाहा। 


मेरे सिराहने के निकट एक बड़ी खिड़की है। खिड़की के पीछे वन बगीचे दिखते हैं। खूब चाँदनी फैली है। कृष्ण पक्ष की एकादशी की ज्योत्सना है। हवा आने के लिए खिड़की खोल रखी है। कितनी देर सोया, याद नहीं। घंटे भर से अधिक नहीं हुआ होगा। अचानक, नींद खुल गयी। ऐसा लगने लगा जैसे मेरे सिराहने की खिड़की पर कोई खड़ा है। जैसे सिर उठा कर उस तरफ़ देखने पर वो दिख जाएगा। 


बहुत डर गया मैं। जबकि डर क्यूँ रहा था, ये भी नहीं जानता था। ऐसा भय की किसी भी तरह सिराहने की खिड़की की ओर देख नहीं पाया। आँखों से ना देखने पर भी, मुझे अच्छी तरह से लगा, खिड़की की छड़ों पर दो हाथ रख के कोई खड़ा है। मैं पूरा ज़ोर लगा कर आँखें बंद करके सोया रहा। सोने की चेष्टा की, किंतु घर में क्या कहीं कोई चूहा सड़ गया है


किसके सड़ने की गंध है?


जैसे आयोडीन, लिंट मलहम जैसी तीव्र गंध के साथ सड़े फोड़े की दुर्गंध मिली हुई सी। इतने दिनों तक घर में कोई घर में कोई रहता नहीं था। फिर क्यूँ


जिसके ऊपर घर की सफ़ाई की ज़िम्मेवारी थी वो कोई भी देखभाल नहीं करता है ये मुझे समझ में गया। ना जाने कौन मेरे मन के अंदर से कहता है, “आँखें खोल कर के देखो। अपने सिराहने की खिड़की की ओर, आँखें खोल कर के देखो ना।


घर के चारों ओर जैसे किसी का तेज प्रभाव है। कोई अमंगल जनक हिंसक उग्र अशांत क़िस्म का प्रभाव। 


इसे बताकर सही सही समझाया नहीं जा सकता। मैं जैसे भयानक रूप से विपदग्रस्त हूँ। वो ऐसी विपदा है जो मुझे मृत्यु के द्वार तक पहुँचा सकती है। यहाँ तक कि वो दरवाज़े की चौखट को पार कर अंधकारमय मृत्यपुरी की हिम शीतल नीरवता में डूबा भी सकती है। मैं किसी भी प्रकार से सिराहने के खिड़की की ओर देखना नहीं चाहता। किंतु मेरे घर के आस पास जो भी अशुभ प्रभाव हो, दीवार के इस ओर उसका प्रभाव नहीं। बहुत सालों पहले ही मेरे पूर्वजों ने मेरे घर में शालिग्राम शिला की स्थापना की थी। इसके रहते कोई भी अशुभ शक्ति अंदर प्रवेश कर ही नहीं सकती थी। मेरे मन ने ही जैसे ये सारी बातें फिर कहीं।


अंधेरी रात में निर्जन घर में मन कितनी बातें कहता है। खिड़की के किनारे ना जाने कैसी एक आवाज़ हुई। अजीब क़िस्म की आवाज़। जाने कौन खिड़की की छड़ों को थोक कर मेरी दृष्टि आकर्षित करना चाहता है।


एक बार, दो बार, तीन बार। 


डर के मारे मेरा कलेजा धक धक करने लगा। किसी को बुलाऊँ? चीख कर। एक बार खिड़की की ओर देखूँ की वो है क्या


अचानक मुझे याद आया कि एक बूढ़ा नेवला बहुत दिनों से बाहर की दीवारों पर काठ की शहतीरों में घर बनाए हुए है। आज शाम को भी एक बार देखा है। शायद ये उसी की आवाज़ है। 


मन में साहस फिर से लौट आया। पसीने से तर-बतर ज्वर जैसे उतर गया। पलट कर अब अश्वस्ती की साँस ली और सोने की चेष्टा की। किंतु मेरे ये भाव अधिक क्षणों तक स्थायी ना रहे। यह बात मेरे मान से बिलकुल नहीं गयी की आज रात मैं अकेला नहीं हूँ। और भी कोई यहीं है। 


निद्राहीन आँखों से वो मेरे ऊपर प्रखर दृष्टि से पहरा रखे हुए है। मुझे वो आराम नहीं करने देगा आज। बार बार निद्रा आती है, फिर यूँ ही जाग उठता हूँ। किंतु आँख खोलने या बिस्तर पर उठ कर बैठने का साहस नहीं होता। और वो ही आवाज़ बीच बीच में खिड़की की छड़ों पर उत्पन्न होते सुनता हूँ। बहुत हल्के हाथों के आघात से निकली आवाज़। जैसे कि आवाज़ कहती है, “आँखें खोल कर देखो। पीछे घूम कर खिड़की की ओर। आँखें खोल कर देखो।


पसीने से बिस्तर भीग गया है। भादों की शुष्क हवा की गर्मी है की क्या है? पता नहीं।


इसी अवस्था में भोर हो गयी। दिन का प्रकाश फैला। लोगों की आवाज़ कानों पर पड़ते ही, रात का डर ना जाने कहाँ गुम हो गया। निश्चिंत मन से 9 बजे तक सोया। उसके बाद उठकर चाय पीकर मौहल्ले में घूमने निकल गया। इस समय एक घटना घटी, पर मैंने उसे कोई विशेष महत्व नहीं दिया। 


किंतु बाद में सारी बातों का मन ही मन में विश्लेषण कर देखने पर वो बहुत आश्चर्यजनक सी मालूम पड़ी थीं। दूसरे मौहल्ले के रास्ते पर रहने वाले अपने उन्हीं ताऊजी से मिलने, उन्हें दिखने के लिए मैं मेडल कल रात ही अपने साथ लेकर निकला था। किंतु वृंदावन के घर निमंत्रण के कारण उनसे मिल नहीं पाया था। आज मुझे देख कर उन्होंने कहा


अरे सुरेन, ठीक हो? तुम आए हो मुझे पता चल गया था। तब रात बहुत हो गयी थी इसीलिए नहीं बुलाया। शायद वृंदावन के घर से लौट रहे थे? मैं उस समय छत पर टहल रहा था। जो गर्मी पड़ी है कल रात से। तुम्हारे संग लोग थे, इसीलिए नहीं बुलाया। वो व्यक्ति कौन है? बहुत लम्बा है। सिख या पंजाबी जैसा लम्बा। शायद तुम्हारा साथी है।”“मेरे संग लम्बा आदमी कल रात में? ये क्या कह रहे हैं ताऊजी?”


तुम कह रहे हो की तुम्हारे साथ कोई आदमी नहीं था? अकेले जा रहे थे? भाई, मेरे आँख के देखने की क्षमता क्या बिलकुल ही ख़राब हो गयी है?”


ऐसा ही होगा ताऊजी। मेरे संग कोई नहीं था। इसके अलावा आपके घर के सामने जो बड़ा आम का पेड़ है उसकी परछाईं में धोखा हो गया होगा। ऐसी भूल होती है।


हैं! क्या अद्भुत कांड है? इतनी भूल होगी आँखों से? आम के पेड़ के इस तरफ़ इस तरफ़ जब तुमने टॉर्च जलायी, तब देखा तुम और तुम्हारे पीछे एक लम्बा सा आदमी। इसके बाद तुम टॉर्च बुझा कर पेड़ की छाया में खो गए। तब भी चाँदनी के प्रकाश में और छाया के अंधकार में मैंने स्पष्ट रूप से देखा वो आदमी तुम्हारे पीछे पीछे जा रहा था। तुम्हारे सिर से भी जैसे एक हाथ अधिक लम्बा। तुम्हारे एकदम पीछे।


मैंने ताऊजी को फिर समझाया और उन से जाने की आज्ञा माँगी। कहा कि बाद में मिलूँगा। सारा दिन वृंदावन के साथ गप्पें मारते बीत गया। पिछली रात का भय दिन के प्रकाश में इतना हास्यास्पद और अजीब लगा की सोचा वृंदावन को भी वो बात बताई जाए। 


रात की गाड़ी से कलकत्ता लौटना था। वृंदावन के घर से चाय पीकर घर लौट आया और स्टेशन की ओर रवाना हुआ। तब साँझ का अंधेरा अच्छी तरह से फैल गया था। 


बावड़ी टोले के बड़े बगीचे से होकर जा रहा था। बगीचे को पार करने में लगभग 5-6 मिनट लगते थे। बहुत बड़ा बगीचा था। बगीचे के बीचों बीच पहुँच कर सहसा पीछे की ओर ना जाने क्या सोचकर देखा। मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गयी।कौन है? कौन है वो वहाँ खड़ा?”


रास्ते से थोड़ा निकट जंगली घासों के बीच आधे अंधकार में एक असाधारण मूर्ति थी। खूब लम्बी। उसके सिर पर घोड़ों के सिरनुमा एक लम्बी प्रकार की टोपी, पतले लोहे की चैन से ठुड्डी से बंधी हुई थी। चित्रों में गोरे सैनिकों के सिर पे जिस प्रकार की टोपी देखी जाती है। वह मूर्ति जैसे निश्चल, निस्पंद अवस्था में मेरी ओर निहारती खड़ी थी। मुझसे मात्र 10 गज या उस से भी कम दूरी पर। मरने को तैयार आदमी की तरह मैं थोड़ा ओर गया। जैसे इस भयानक कौतूहल को मुझे हल करना ही था। 


मूर्ति ना हिलती थी ना डुलती थी, जैसे निश्चल पत्थर की मूर्ति हो। किंतु बहुत स्पष्ट देख रहा था, मात्र 7-8 गज दूर वो मूर्ति थी और घोड़े के बालों की लम्बी टोपी और इस्पात के चैन का स्टाम्प स्पष्ट दिख रहा था। मेरे पाँव थरथर करके काँपने आगे। सारा देह ना जाने कैसे सुन्न हुआ जा रहा था। सिर जैसे बहुत हल्का हो गया था। लगता था की और आधे मिनट इसी तरह रहा तो मूर्छित होकर गिर पड़ूँगा। कारण, उसी भीषण मूर्ति के आमने सामने मैं खड़ा था। किंतु ठीक उसी समय, बौरिया बगीचे की राह पर लालटेन लिए कोई आया। 


दो तीन लोगों के गले की आवाज़ सुनकर मेरा साहस लौट आया। मैंने उन लोगों को चिल्लाकर बुलाया, “सुनिए, सुनिए! इधर आइए।


वे दौड़ कर आए। मुझे वहाँ जंगल में देखकर वे लोग आश्चर्यचकित होकर बोले,  वहाँ क्या है बाबू? क्या हुआ है?”


बाबू, यहाँ खड़े होकर क्या देख रहे थे? इस भूतहे पेड़ को?”


मैंने भी देखा वो भूतहा पेड़ ही था। ऊपर की ओर की पत्तियों और डालियों को छाँट कर पेड़ को ठीक हॉर्सगार्ड लोगों की टोपी की तरह बना दिया गया था। लोगों की आँखों से कैसी कैसी भूल होती है?


कल मैंने ताऊजी को चश्मा लेने की सलाह दे डाली थी। ये सोचकर मन ही मन में बहुत लज्जित हुआ। वे वृद्ध आदमी थे उनकी आँखों से भूल तो हो ही सकती थी। मेरी ही जब ये अवस्था थी। उन लोगों ने मुझे प्रकाश दिखते हुए स्टेशन पहुँचा दिया। 



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दूसरे दिन स्कूल में सुधीर का मेडल लौटा दिया। सुधीर ने कहा,  “आपको दादाजी ने एक बार बुलाया है। मेरे साथ छुट्टी के बाद मेरे घर आइए। उन्होंने आपको ले आने को कहा है।


सुधीर के दादाजी ने कहा, “जैसे ही सुधीर से सुना आप मेडल लेकर गाँव चले गए हैं मैं बहुत डर गया था मास्टर साहब। आपके गाँव का ठिकाना तक नहीं जनता था नहीं तो एक तार भेज देता। वो मेडल मेरे पिताजी को एक गोरा सैनिक दे गया था। गिरवी रख गया था। और छुड़ा नहीं पाया, तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था पर पिताजी बताते थे कि वो बहुत पियक्कड़ और गंवार था। उस मेडल से विपद हो रही है। 


हम लोगों के वंशज के अलावा दूसरा कोई ले तो उसके जीवन में विपद जाती है। बहुत पहले की बात है, मेरे एक बहनोई ने एक बार किसी की नहीं सुनी मेडल दिखने घर ले गया। उसी दिन संध्या के समय वो छत से गिरकर मर गया। मृतक की पॉकेट से वो मेडल निकला।


- “छत पर से — ? पॉकेट में मेडल पाया गया?”


हाँ मास्टर साहब, मेरा अपना बहनोई। झूठी बातें तो मैं बोलूँगा नहीं, ये 27-28 वर्ष पहले की बात है। उसके अलावा और दो-एक लोगों ने लिया था। तत्काल ही सभी वापस दे गए थे। कहते थे रात में डर लगता है। शरीर काँपने लगता है। ऐसा लगता है मानो कोई पीछा कर रहा है। वह बाहरी लोगों के लिए सहन योग्य नहीं है। प्राण तक की हानि हो सकती है।




एक बात बताना ज़रूरी है। महीने भर बाद मैं फिर देश गया। बौरिया बगीचे में जहां उस रात मुझे डर लगा था, उस ओर निहार कर देखने पर वो भूतहा पेड़ कहीं मेरी दृष्टि में नहीं आया। जिस आम के पेड़ के पास भूतहा पेड़ देखा था वहाँ दिन के उजाले में अच्छी तरह से देखा पर कहीं भी वो पेड़ मुझे नहीं मिला।


पेड़ काट लेने के बाद जो खूँटी रह जाती है उसका भी कोई चिन्ह नहीं था। उस जगह को देख कर ये आभास भी नहीं होता था की किसी समय वहाँ कोई पेड़ रहा होगा। 

तो फिर वो क्या था? वो क्या था?


ये सवाल आज तक मुझे परेशान करता है। 




लेखक: बिभूतीभूषण बंदोपाध्याय



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