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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

उँगली (UNGALI) - HINDI HORROR STORY

 



उस साल कड़ाके की सर्दी पड़ी थी। 


संजय ट्रेन से नीचे उतरा और उसने देखा कि प्लैटफ़ॉर्म पर बिलकुल मरघट जैसा सन्नाटा था। उसने घड़ी की ओर नज़र डाली, रात के एक बज रहे थे। ट्रेन से उतरने वाला वो इकलौता शख़्स था। 


यूँ तो संजय इस स्टेशन पर बचपन से आ रहा था, लेकिन रात के इस सन्नाटे में, यह जगह अजीब ही लग रही थी। तभी ट्रेन ने ज़ोर से हुंकार भरी, और संजय यादों की दुनिया से बाहर आ गया। धीरे धीरे उसने स्टेशन के गेट की तरफ़ चलना शुरू कर दिया। 


रह रहकर वो स्टेशन से क़स्बे तक जाने वाली सड़क के बारे में सोच रहा था।


वो जानता था कि अगले 3 किलोमीटर तक इस सड़क पर उसे कुछ नहीं मिलने वाला

था। लेकिन देर रात की ट्रेन से आना काफ़ी ज़रूरी था। पिताजी की तबियत अचानक ही बिगड़ी थी, और वो एक पल भी गँवाना नहीं चाहता था। इसीलिए खबर मिलते ही, वो तुरंत दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा, और अपने क़स्बे आने वाली रात की आख़िरी ट्रेन पकड़ ली। पर एक पैसेंजर ट्रेन को आगे निकालने के लिए संजय की डेली ट्रेन को काफ़ी देर तक रोक दिया गया था। इसीलिए जो ट्रेन 11 बजे पहुँचने वाली थी, वो रात के 1 बजे जंक्शन पर आ कर लगी।


स्टेशन से बाहर निकलते ही, संजय के दिमाग़ में कई सारी यादें ताज़ा हो गयीं। कैसे वो पहली बार दिल्ली जाने के लिए पिताजी के साथ इसी प्लैटफ़ॉर्म पर आया था। लेकिन सबसे ज़्यादा यादें उस स्टेशन या प्लैटफ़ॉर्म की नहीं, बल्कि स्टेशन से क़स्बे तक जाने वाली सड़क की थीं। 


दरसल, वो सड़क बिलकुल वीरान थी। रात 11 बजे दिल्ली से आने वाली ट्रेन के चक्कर में एक आध टेम्पो वाले उस सड़क पर खड़े रहते थे। पर रात के 1 बजे तो वहां बिलकुल भुतवासा ही हो रखा था।


उसके अलावा, संजय के ज़हन में बार बार इस सड़क के बारे में सुनी कई सारी कहानियाँ हिलोरे मार रही थीं। कैसे वो बचपन में सुनता की इस सड़क पर एक सफ़ेद साड़ी वाली चुड़ैल घूमती है, जो पैदल जा रहे आदमियों को अपना शिकार बनाती है। या फिर कैसे यहां देर रात में चलने वाले टेम्पो और गाड़ियों के सामने अचानक एक सिर कटा बच्चा आ जाता है। 


लेकिन संजय अब बड़ा हो चुका था। 


हथेलियों से अपने बाजुओं को रगड़ता हुआ संजय उस वीरान सड़क पर रात के अंधेरे में चला जा रहा था। चलते चलते संजय ने उस सड़क पर कुछ ऐसा देखा जिसने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया 


संजय से थोड़ी ही दूर, सड़क के किनारे पर एक बूढ़ी औरत एक टोकरा और लालटेन लिए एक दरी पर बैठी थी। थोड़ा पास पहुँचे पर संजय ने देखा, की उस औरत के टोकरे में मूँगफलियों की एक ढेरी थी।


"मूँगफली खाएगा बेटा?" उस बुढ़िया ने एक काँपती आवाज़ में पूछा। 


ठंड और लम्बा सफ़र झेलने के बाद संजय को भूख भी लग आयी थी। साथ ही इस ठंड में बुढ़िया को इस तरह मूँगफली बेचते देख, संजय को उस पर दया भी आ गयी।


क्या भाव दीं अम्मा?” संजय ने पूछा।

दस रुपए की 100 ग्राम।बुढ़िया ने मुस्कुराते हुए कहा।


संजय ने तुरंत एक दस का नोट अम्मा की तरफ़ बढ़ाया, जिसके बदले में एक काग़ज़ के खलते में बिना तोले उस बुढ़िया ने मूँगफली भर दीं। संजय ने बिना कुछ कहे वो खलता लिया और आगे बढ़ चला।


मूँगफली खाते खाते, अचानक संजय को खलते के अंदर एक अजीब सी चीज़ का एहसास हुआ। उसने खलते से उस चीज़ को बाहर निकाला तो उसके पैर मानो ज़मीन में धँस गए। 


खलते के अंदर से एक कटी हुई उँगली निकली थी, जो अब संजय के हाथ में थी। उस उँगली के हाथ में एक हरे पन्ने की अंगूठी थी जो रात के अंधेरे में भी चमक रही थी।


थोड़ी देर तक तो संजय उस उँगली को अपनी फटी आँखों से घूरता रहा, लेकिन जैसे ही उसे होश आया, तो उसने वो उँगली और खलता एक चीख मारते हुए सड़क के किनारे अंधेरे में फेंक दिया। 


उसके बाद वो उस बूढ़ी औरत को देखने के लिए पीछे मुड़ा, लेकिन उस सड़क पर उस बुढ़िया का कोई निशान नहीं था। संजय अभी ज़्यादा आगे नहीं आया था, और इस सड़क पर कोई मोड़ भी नहीं था। फिर अचानक वो बुढ़िया कहाँ चली गयी? 


यही सोचते सोचते, संजय ने  उस बुड्ढी और अपनी क़िस्मत को मन ही मन कुछ गालियाँ दीं और तेज़ी से कदम आगे बढ़ाए। पर तभी उसने देखा, सामने सड़क के अंधेरे और धुँध में से एक साया उसी की तरफ़ उड़ता हुआ रहा था।


बचपन की सारी कहानियाँ, संजय के दिमाग़ में एक बार फिर से ताज़ा हो आयीं।

क्या हो सकता है ये? चुड़ैल? सिर कटा बच्चा?


 डर एक बार फिर संजय के ऊपर हावी होने लगा। पर तभी अंधेरे को मात देता, वो साया संजय के सामने खड़ा हुआ, “कहीं जाएँगे बाबूजी?”  यह एक रिक्शेवाला था।


संजय की जान में जान आयी, और वो लपक कर उस रिक्शे पर कूद गया। वो जल्द से जल्द यहाँ से निकल जाना चाहता था रिक्शा क़स्बे की ओर चल पड़ा। 


क्या हुआ बाबूजी, परेशान लग रहे हैं।रिक्शेवाले ने मुँह से भाप छोड़ते हुए पूछा।


क्या बताऊँ, भैया।संजय बोला, “ना जाने कैसे कैसे लोग हैं इस दुनिया में।

और इसी के साथ संजय ने उस बुड्ढी और उँगली की कहानी रिक्शेवाले को बता दी।


बाबूजी,” रिक्शेवाला एक हल्की सी हंसी के साथ पीछे पलट कर बोला, “यह उँगली तो नहीं थी?” 


संजय ने देखा, वही उँगली, उस रिक्शेवाले के हाथ में थी। रिक्शेवाला किसी राक्षस की तरह हंसे जा रहा था। संजय ने उस रिक्शे से कूदना चाहा लेकिन वो रिक्शा किसी ट्रेन की तरह भागे जा रहा था। रिक्शेवाले की हंसी, उसके रिक्शे की गति की तरह हर पल बढ़ती ही जा रही थी, की तभी संजय ने रिक्शे से छलांग लगा दी। 


घिसता, लुढ़कता, संजय कई खरोंचों और घावों के साथ ज़मीन पर जा गिरा। ताक़त इकट्ठी कर वो उठा और दौड़ने लगा। उसने देखा, रिक्शेवाला पलट कर उसी की तरफ़ रहा था।


बाबूजी, कहाँ जा रहे हो? घर तो छोड़ दूँ आपको।वो रिक्शेवाला हंसते हुए बोला।


संजय अब किस दिशा में भाग रहा था वो खुद नहीं जानता था। उसने पलट कर देखा, तो इस बार उस रिक्शे पर वही बुड्ढी भी बैठी हुई हंस रही थी।


"मूँगफली खाएगा बेटा?" एक शैतानी हंसी उस बुढ़िया के मुँह से फूटी।


अंधेरे में भागते हुए, संजय का पैर किसी चीज़ में उलझा और वो सड़क के किनारे एक खड्ड में जा गिरा। उसने खड़े होने की कोशिश की, लेकिन एक भयानक दर्द उसके पाँव में दौड़ गया। उसके पैर की हड्डी टूट चुकी थी। 


संजय अब उस खड्ड में पड़ा, उस रिक्शेवाले के आने का इंतज़ार कर रहा था। शायद उसने अपनी मौत से समझौता कर लिया था। पर काश, मरने से पहले वो एक बार, अपने पिताजी को देख पाता।


उसके इन्हीं ख़यालों के बीच, एक साया सड़क पर दिखायी दिया। संजय ने डर के मारे अपनी आँखें भींच लीं।अरे कौन है उधर? ठीक तो हो भैया?”


ये तो कोई नयी ही आवाज़ थी।


एक आदमी सावधानी के साथ खड्ड में उतरा और संजय को देखा। उसने सहारा देकर संजय को खड़ा किया और जैसे तैसे उसे फिर से सड़क पर ले आया। 


इतनी रात में इस सड़क पर क्या कर रहे हो भई?” 

उस भले मानस ने पूछा, “नए हो क्या?”


संजय ने उसे अपनी कहानी बताने की कोशिश की, लेकिन दर्द और डर के कारण उसके गले से केवल सिसकियाँ ही निकल पायीं।


वो आदमी संजय की हालत समझ चुका था, उसने संजय का एक हाथ अपने कंधे पर रखा और उसे सहारा देकर उठते हुए बोला,"मेरा ट्रांसपोर्ट का काम है, यहीं थोड़ी दूर पर ऑफ़िस है मेरा। चलो वहीं चलो मेरे साथ।"


संजय को उस सड़क पर थोड़ी ही दूर एक कमरे में बल्ब की रोशनी दिखी। उस दूर जलते बल्ब और इस अजनबी की दया ने संजय के डर पर मानो मरहम का काम किया।

 

धीरे धीरे ही सही, पर थोड़ी देर में वो दोनों उस आदमी के ऑफ़िस तक पहुँच गए। वहां उस आदमी ने संजय को एक बेंच पर लिटा दिया। ऑफ़िस की गर्माहट से संजय के घाव ताज़ा होने लगे। "काफ़ी चोट लगी है तुम्हें तो।" वो आदमी संजय का मुआयना करते बोला, "डॉक्टर के पास सुबह चलेंगे, पर अभी मैं थोड़ी पट्टी कर देता हूँ।"


ये कहकर वो आदमी, ऑफ़िस के एक कोने में कुछ ढूँढने लगा। संजय ने अपना टूटा पैर हिलाने की कोशिश की, लेकिन दर्द के मारे एक कराह उसके मुँह से फूट पड़ी।


"अच्छा ये तो बताओ भई," वो आदमी एक दवाइयों का डब्बा लाते हुए बोला, 

"तुम उस खड्डे में गिरे कैसे?"


संजय ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला ही था की तभी उसका ध्यान, उस आदमी के हाथ में थामे डब्बे की ओर गया। उसने देखा कि वो आदमी, उस डब्बे में कुछ थामे हुआ था, जिसे संजय नहीं देख पा रहा था। अचानक ही संजय की कृतज्ञता, शक में बदल गयी। 


"अरे मैं तो भूल ही गया," उस आदमी को अचानक कुछ याद आया, "मैं थोड़ा पानी गरम कर देता हूँ। उस से तुम्हारे घाव धो देंगे।"


यह कहते हुए उसने दवाओं का वो डब्बा संजय के हाथ में थमा दिया, और खुद कोने में रखी एक सिगड़ी पर पानी गरम करने लगा।


संजय ने तुरंत उस डब्बे को खंगालना शुरू किया, वो देखना चाहता था की कहीं वो उँगली उसका पीछा करते हुए यहाँ तक तो नहीं आ गयी। और पूरी छानबीन करने के बाद संजय ने पाया की उस डब्बे में सिर्फ़ दवाएँ ही थीं। 


"मिली क्या?" सिगड़ी के पास उकड़ूँ बैठे हुए उस आदमी ने बिना संजय की ओर देखे पूछा, "उसमें नहीं मिलेगी।"


"क्या?" संजय ने पूछा।


वो आदमी पलटा और उसके हाथ में एक हांडी भर गरम पानी था। वो संजय के पास आया और उस खौलते पानी में हाथ डाल कर बोला, "इसे ही ढूँढ रहे हो ना?"


संजय ने देखा, की उस आदमी ने खौलते हुए पानी से वही उँगली निकाली। 

"यही उँगली थी ना?" ये कहकर वो आदमी ज़ोर से हंसा।


संजय के शरीर का सारा खून एकाएक बर्फ़ हो गया। वो आदमी, उस उँगली को पड़के हुए पागलों की तरह हंसे जा रहा था। संजय के सिर ने चक्कर खाना शुरू किया और निढाल होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।


सुबह की रोशनी में संजय की आँख खुली, उसने देखा कि अब वो अकेला नहीं था, बल्कि किसी सरकारी हॉस्पिटल के जनरल वार्ड में था। उसकी टांग पर प्लास्टर बांधा था और बदन पर जगह जगह पट्टियाँ।


सुबह की गरम धूप और अपने पास की भीड़ देखकर संजय का डर जाता रहा। और तब उसने अपने पास खड़े एक नर्स से पूछा, "मैं यहाँ कैसे आया?"


मैं तो अभी आया हूँ। जो रात की ड्यूटी पे होगा उसी को मालूम होगा।नर्स ने बड़ी बेरुख़ी से जवाब दिया।


संजय ने एक राहत की साँस ली, और घर फ़ोन करने के बारे में सोचने लगा। आख़िरकार उसके परिवार को उसकी चिंता हो रही होगी। 


ये टांग को क्या हुआ?” उसी नर्स ने बग़ल के ख़ाली बेड की चादर झाड़ते हुए पूछा।

संजय ने एक लम्बी साँस ली, और रात की सारी कहानी बयान कर दी। अब उसे डर नहीं लग रहा था।


नर्स ने एक बार फिर से चादर को ज़ोर से झाड़ा और उसमें से कुछ उड़ता हुआ संजय के पेट पर गिरा। संजय ने गौर से देखा, तो ये वही उँगली थी। 


नर्स ज़ोर से हंसा"यही उँगली थी ना?"


संजय ने देखा, वो हॉस्पिटल नहीं, बल्कि उसी सड़क पर पड़ा था, दिन कहीं ग़ायब हो चुका था और रात के अंधेरे में वही बुड्ढी, रिक्शेवाला, आदमी और नर्स उसे घेर कर हंसे जा रहे थे। 


क्या हुआ बेटा?” बुड्ढी ने पूछा, “भागेगा नहीं?”


संजय ने ध्यान दिया, उसकी टांग टूटी ही नहीं थी। वो किसी मेंढक की तरह फुदक के उठा और उन लोगों से दूर भागने लगा। जैसे तैसे वो भागते हुए क़स्बे तक पहुँचा, लेकिन उसके बाद संजय की दिमाग़ी हालत दिन  दिन बिगड़ती गयी।


यह कहानी संजय ने मुझे आज से कुछ साल पहले सुनायी थी, और आज जब मुझे भी मजबूरी में उसी देर रात की ट्रेन से आना पड़ा है, तो मैं उसी वीरान सड़क पर खड़ा हूँ। बिलकुल अकेला। 


मेरे सामने एक बुढ़िया टोकरी में मूँगफली लिए सड़क के किनारे बैठी है। 

और वो मुझसे पूछ रही है, 


"मूँगफली खाएगा बेटा?"




( समाप्त )





UNGALI  HINDI HORROR STORY 





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