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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

अलमारी (ALMAARI - THE SAFE) HINDI HORROR STORY
















यह क़िस्सा 70 के दशक का है जब मेरे दोस्त के दादा जी ने कानपुर के देहात में एक पुरानी कोठी ख़रीदी थी। उस कोठी के साथ काफ़ी और चीजें साथ ही आयीं थीं, मसलन थोड़ा बहुत पुराना फ़र्निचर, बिस्तर, अलमारी, और मेज़ें। और साथ में कई सारे पुराने पेड़ जो कोठी के बाहर के बाग में लगे हुए थे।

पर सबसे आकर्षक चीज़ थी वो लोहे की अलमारी, जिसे खोलना सम्भव ही नहीं हो पाया। वह अलमारी लंदन के किसी ब्राउनिंग नाम की कम्पनी थी और आसपास के सभी चाबी-वाले उसका ताला खोलने में नाकाम हो चुके थे। कई लोग उसे एक तिजोरी बोलते, लेकिन उसका क़द इतना बड़ा था कि  दादा जी जैसे 3 लोग उसमें एक साथ आ सकते थे। इसी अलमारी के बारे में सभी घरवाले सोचते रहे कि
 उस घर में होने वाले एक अजीब वाक़ये ने सब को हैरान करना शुरू कर दिया।

होता यह था कि, हर शुक्रवार की सुबह, घरवालों को कोठी का मुख्य द्वार खुला मिलता और घर के बाहर से एक इंसान के पैरों के निशान घर के अंदर घुसते हुए, उस अलमारी वाले कमरे तक जाते दिखते। वो निशान उस अलमारी के सामने पहुँच कर ख़त्म हो जाते। हर शुक्रवार की सुबह यही नज़ारा मिलता।

घरवाले परेशान थे कि आख़िर कौन उनके घर में घुस रहा है। घर के मुख्य द्वार पर हर तरह के ताले लगाए गए, लेकिन उन तालों के बावजूद, शुक्रवार की सुबह घर का दरवाज़ा पैरों के निशान के साथ खुला मिलता। तालों के बाद घर के दरवाज़े पर बल्लम, और फिर मेज़ कुर्सी भी लगा कर रखी गयीं, की बाहर से दरवाज़ा खोलना बिलकुल भी नामुमकिन हो जाए, लेकिन इस सब से भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ। और फिर एक रात, मेरे दोस्त के दादा जी ने खुद ही जाग कर देखना चाहा की आख़िर होता क्या है।

दादा जी, गुरुवार की रात को ही घर की छत पर एक कोने में अपनी मचान बना कर बैठ गए। पूरी रात नींद से लड़ते हुए, वो घर के मुख्य द्वार की तरफ़ और आस पास नज़र डालते रहे लेकिन कोई नहीं दिखा। काफ़ी मुस्तैद होने के बाद भी दादा जी को नींद आ ही गयी, पर देर रात उनकी नींद एक आवाज़ से खुली -

घर की कोठी का मुख्य द्वार खुला। 

दादा जी नींद छोड़ उछले और उन्होंने बाहर हर दिशा में आँखें दौड़ायीं, लेकिन घर के बाहर कोई नहीं दिखा। भागते हुए वो घर के अंदर पहुँचे और देखा कि पैरों के निशान घर के दरवाज़े से होकर अंदर आ चुके थे। वो अलमारी वाले कमरे तक गए लेकिन पैरों के निशान के अलावा उन्हें और कुछ नहीं दिखा। पैरों के निशान अलमारी तक पहुँचने के बाद ख़त्म हो चुके थे। अलमारी का ताला ज्यों का त्यों था। काफ़ी ज़ोर लगाने पर भी वह नहीं खुली। कुछ लोगों ने यहाँ तक कहा कि इस अलमारी का ताला अंदर से टूट चुका है, तो इसके पल्ले उखाड़ने के अलावा अलमारी खोलने का और कोई तरीक़ा नहीं है।

उसके बाद दादा जी ने पूरे घर की तलाशी ली, लेकिन कोठी में किसी भी बाहर वाले के होने के निशान नहीं मिले। दादा जी ने सोच लिया की अगले गुरुवार वो फिर से कोशिश करेंगे।


अगले गुरुवार की रात दादा जी ने छत की बजाय, बाहर बाग में डेरा जमाया। इस बार वो एक आम के पेड़ पर चढ़ कर बैठ गए। उनके पास उनके पिताजी की बंदूक़ और थोड़ा सा पानी था। नींद और मच्छरों से लड़ते हुए देर रात उनका ध्यान एक आवाज़ ने खींचा।

दादा जी ने अंधेरे में देखने की कोशिश की, तो घर का दरवाज़ा धीरे से खुल रहा था, लेकिन कोठी के बाहर कोई नहीं था।

कोई, घर के अंदर से दरवाज़ा खोल रहा था।

दादा जी पेड़ पर बैठे चुपचाप ये देखते रहे, और उनके हाथ अपनी बंदूक़ पर और कस गए। दरवाज़ा धीरे धीरे पूरा खुला और उन्होंने देखा -

कोठी का दरवाज़ा किसी औरत ने खोला था। उसके बाल किसी बरगद की जटाओं जैसे उसके घुटनों तक लटक रहे थे। वो औरत दरवाज़ा खोल कर धीरे धीरे कोठी से बाहर चलने लगी। वो चलते चलते दादा जी के पेड़ के पास आने लगी। उनके हाथ बंदूक़ पर कसे हुए थे, लेकिन हाथ में आने वाले पसीने से वो उनकी पकड़ से फिसलने लगी थी।

उन्होंने देखा कि कैसे वो औरत उनके पेड़ के ठीक नीचे आकर खड़ी हो गयी। और जैसे ही उसने ऊपर दादा जी की तरफ़ देखा, उनके शरीर का सारा खून डर के मारे जम गया। 

दादा जी बिना हिले, बिना कुछ कहे, अपनी साँस रोके उस औरत को देखते रहे, जिसका चेहरा एकदम सपाट था। उसके नाक-नक़्श सब मानो घिस घिस कर मिटा दिए गए थे।

पर फिर उस औरत ने सामने देखा और बाग से बाहर होते हुए, सड़क के दूसरी ओर के मैदान की तरफ़ चली गयी।

दादा जी चुपचाप पेड़ से उतर कर उस औरत के पीछे पीछे चलने लगे, और तब उन्होंने देखा कि वो औरत एक पीपल के पेड़ तक पहुँची और फिर उस पर चढ़ने लगी। पेड़ की घनी पत्तियों के बीच वो ग़ायब हो गयी। 

ये सब देखने के बाद दादा जी की हिम्मत नहीं हुई कि वो उस पीपल के पेड़ के पास जाएँ। उसके बाद वो तेज़ी से कोठी लौट गए और उन्होंने देखा, की कोठी के दरवाज़े से पैरों के निशान, अलमारी वाले कमरे तक जा रहे थे।

अगले ही दिन, दादा जी, ने कुछ मज़दूर बुलवा कर वो लोहे की अलमारी घर से बाहर निकलवा दी। कुछ कबाड़ वालों ने उस अलमारी के अच्छे पैसे दादा जी को देने चाहे, लेकिन उन्होंने, उसे सड़क के पार के एक तालाब में उन्होंने फिंकवा दिया। 

उसके बाद फिर कभी वो पैरों के निशान घर में नहीं दिखे, और ना ही कभी कोठी का दरवाज़ा खुला मिला।

और एक दिन जब मेरे दोस्त के दादा जी मेरे दोस्त और मेरी गुज़ारिश पर यह क़िस्सा हमें सुना रहे थे, तो मेरे दोस्त ने पूछा, "पर फिर घर में घुसता कौन था? वो औरत तो घर से बाहर निकल रही थी।"

दादा जी हल्के से हंसे, और बोले, "जब मैं उस औरत का पीछा कर रहा था तब मैंने देखा, उसके पैर उल्टे थे। वो औरत घर में घुस कर अलमारी तक नहीं जाती थी, बल्कि, अलमारी से निकल कर घर से बाहर पीपल के पेड़ तक जाती थी। शायद इसीलिए उस अलमारी का ताला उसे बंद करने वाले ने तोड़ दिया था।"

"हाँ, उसके बाद गाँव के कई लोगों को वैसी ही एक औरत गाँव के तालाब से निकलती हुई दिखायी देती थी।"


(समाप्त)

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