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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

खपड़िया बाबा (KHAPADIYA BABA) HINDI HORROR STORY



चेतावनी: इस कहानी के कुछ अंश विचलित कर सकते हैं। सोच समझकर पढ़ें। 

खपड़िया बाबा ने एक आख़िरी मंत्र पढ़ा और उस खून मिले पानी से उस साधु के कटे सर पर एक तिलक लगाया। और फिर, मामा जी ने असम्भव को सम्भव होते देखा।


यह कहानी मेरे मामा जी की है, जिन्होंने 30 की उम्र आने से पहले ही सन्यास ले लिया था। 

परंतु मामा जी हमेशा ही धार्मिक नहीं थे। बल्कि गेरुआ ओढ़ने से पहले वो मोहल्ले और गाँव में एक गुंडे की तरह जाने जाते थे। मार पीट और गुंडागर्दी के साथ उनके हाथ कुछ लोगों के खून से भी सन चुके थे। इसीलिए जब वो साधु बने, तो मेरे नाना जी और बड़े मामा को थोड़ी राहत मिली।

मामा जी, अब साल में एक दो चक्कर हमारे घर पर भी लगा जाते। माँ को अब उनपर कुछ ज़्यादा प्यार आने लगा था। मामा जी बदलते मौसम की तरह हमारे यहाँ आते, और एक या दो दिन रुककर फिर निकल जाते।

वो जब भी आते तो बताते कि कैसे वो रामेश्वरम से लेकर सोमनाथ, केदारनाथ, तुंग़नाथ और तो और हिमालय तक जा चुके हैं। वहाँ से वो बटोर कर लायी हुई कहानियाँ हमें सुनाते। ऐसी ही एक कहानी उन्होंने हमें सुनायी थी खपड़िया बाबा की।

खपड़िया बाबा एक पहुंचे हुए साधु थे, इसकी वजह उनका जप और तप नहीं, बल्कि वो चीज़ थी, जो उनके पास थी। खपड़िया बाबा का असली नाम शायद केवल वो खुद ही जानते थे, क्यूंकी बाक़ी सब के लिए तो वे खपड़िया बाबा ही थे। 

और उनके इस नाम की वजह थी, एक खोपड़ी, जो उन्हें कहाँ से मिली थी, यह भी उनके नाम की तरह कोई नहीं जानता था। वो खोपड़ी कोई साधारण खोपड़ी नहीं, बल्कि एक त्रिकालदर्शी साधु की थी।

त्रिकालदर्शी समझते हैं ना आप?

जब कोई साधक परम ज्ञान की प्राप्ति करके भूत, वर्तमान और भविष्य, यानी तीनों कालों को देखने की शक्ति पा लेता है, तो वह त्रिकालदर्शी कहलाने लगता है। ऐसे व्यक्ति से दुनिया की कोई बात नहीं छिपी होती। क्या हुआ, क्या हो रहा है, और क्या होगा, यह सब उसे पता होता है।

तो ऐसे ही एक त्रिकालदर्शी साधु की खोपड़ी खपड़िया बाबा के पास थी। और सबसे मज़े की बात यह थी, कि वो खोपड़ी ज़िंदा थी। 

उस खोपड़ी वाले साधु का नाम तो शायद खपड़िया बाबा खुद भी नहीं जानते थे, लेकिन यह बात कई लोगों ने सुन रखी थी, कि  वो खोपड़ी हज़ारों साल पुरानी है।

मामा जी ने जब सुना की खपड़िया बाबा आसपास ही हैं, तो उनपर एक सनक सवार हो गयी, और वो उनके दर्शन करने निकल पड़े। 

संगम से बनारस, केदारनाथ, और ना जाने कहाँ कहाँ घूमते हुए, मामा जी हिमालय की घाटी में बसे किसी गाँव में जा पहुंचे। वहाँ उन्हें पता पड़ा की खपड़िया बाबा जैसा दिखने वाला एक साधु, पहाड़ों में कहीं रहता है।

बाद, फिर मामा जी राशन पानी और कुछ गरम कपड़े लेकर हिमालय की पहाड़ियों में खो गए। दिन रात, भटकते हुए मामा जी का खाना और शक्ति दोनों ही ख़त्म हो रही थी, जब एक रात एक भयंकर बर्फीला तूफ़ान उठा। मामा जी का तम्बू और आग, दोनों ही ना बच सके। 

वो बताते कि कैसे उनकी आख़िरी याद बर्फ़ के एक ढेर के नीचे दबे होने की थी। वो मदद के लिए चिल्लाये, लेकिन मुंह खोलते ही, बर्फ़ उनके गले तक भर गयी। सर्दी से काँपते हुए उन्होंने अपनी आख़िरी सांसें लीं, और आँखें बंद कर लीं।

पर फिर उनकी आँख खुली, एक झोपड़ी के अंदर। 

जिस खपड़िया बाबा को ढूँढते हुए वो भटक रहे थे, उसी ने उनकी जान बचा ली थी। मामा जी ने खपड़िया बाबा को देखा, पर उनके व्यक्तित्व में उन्हें कुछ ख़ास ना लगा। उनकी कल्पना में खपड़िया बाबा, एक लम्बे चौड़े प्रभावी व्यक्तित्व के स्वामी थे, लेकिन सामने आने पर वे एक दुबले शरीर वाले साधारण से साधु निकले, जिनकी उमर भी मामा जी को अधिक नहीं लगी। बाबा की बायीं आँख पर लगा एक कटाव ना जाने कौनसी कहानी अपने अंदर छिपाए हुए था। 

ख़ैर, ठीक होने के बाद खपड़िया बाबा ने मामा जी को विदा करना चाहा, लेकिन उन्होंने बाबा के पैर पकड़ लिए। उन्होंने बाबा से विनती की कि बस एक बार उन्हें उस त्रिकालदर्शी खोपड़ी के दर्शन करवा दें, उसके बाद वो चुपचाप चले जाएँगे। लेकिन खपड़िया बाबा सिर्फ़ दिखते दुबले थे, उन्होंने मामा जी को अपनी झोपड़ी से बाहर पटक दिया।

मामा जी रात भर झोपड़ी के बाहर देर डाले बैठे रहे। वो चीखते रहे की बाबा एक बार उन्हें उस खोपड़ी से मिलवा दें, लेकिन अंदर से खपड़िया बाबा ने उन्हें जवाब तक ना दिया। बल्कि देर रात मामा जी ने सुना कि अंदर से ऐसी आवाज़ें आ रही थीं मानो दो लोग बात कर रहे हों। एक आवाज़ तो खपड़िया बाबा की थी, पर दूसरी किसकी थी? 

सुबह खपड़िया बाबा ने अपनी झोपड़ी का दरवाज़ा खोला। मामा जी ने फिर से उनके पैर पकड़ लिए। पर इस बार बाबा ने उन्हें दुत्कारा नहीं। बल्कि बाबा ने मामा जी से पूछा, की यदि वो उन्हें खोपड़ी से मिलवा दें, तो वो फिर उन्हें तंग नहीं करेंगे और अपने गाँव लौट जाएँगे। 

मामा जी दुनिया भर की सारे क़समें खा कर राज़ी हो गए। बस उसी रात खपड़िया बाबा ने मामा जी को खोपड़ी के दर्शन कराने का वादा कर दिया।

रात को आसान जमा। मामा जी ने देखा की खपड़िया बाबा ने एक कांसे की थाली में थोड़ा पानी डालकर पहले उसे अभिमंत्रित किया। उसके बाद उन्होंने उस थाली के इर्द गिर्द एक घेरा बनाया। और फिर उन्होंने निकल एक चमड़े का थैला। 

मामा जी साँस रोके यह सब देख रहे थे। 

खपड़िया बाबा ने थैले में हाथ डालकर उस खोपड़ी को निकला। मगर यह क्या, वह एक नरमुण्ड नहीं था, बल्कि एक सर था। एक साधु का कटा सर। जिसके बाल, दाढ़ी, मूँछ, खाल, आँखें नाक, कान, सब सही सलामत थे। 

यह खोपड़ी सिर्फ़ एक हड्डी नहीं, बल्कि पूरा सर था। मामा जी ने दुनिया में काफ़ी कुछ देखा था, लेकिन उस रात उन्हें भी काठ मार गया था। 

खपड़िया बाबा ने वो खोपड़ी उस थाली के पानी में टिकायी, कुछ मंत्र पढ़े और फिर मामा जी से अपना हाथ आगे करने के लिए कहा।

मामा जी ने किसी आदेश का पालन किया और बाबा ने एक छुरा लेकर मामा जी के हाथ में एक चीरा लगा दिया। खून की एक पतली धार उनके हाथ से बह चली, जिसे बाबा ने थाली के अंदर के पानी के ऊपर लगा दिया। थाली का पानी, मामा जी के खून से लाल होता जा रहा था।

खपड़िया बाबा ने एक आख़िरी मंत्र पढ़ा और उस खून मिले पानी से उस साधु के कटे सर पर एक तिलक लगाया। और फिर मामा जी ने असम्भव को सम्भव होते देखा।

उस कटे सर ने धीरे से आँख खोलीं, जैसे कोई गहरी नींद से जाग हो। मामा जी देख रहे थे की कैसे उस सर ने अपनी आँखें घुमा कर झोपड़ी में चारों ओर देखा। उसकी नज़र सीधी मामा जी की आँखों से मिली। 

मामा जी के शरीर के साथ उनके अंदर का खून भी जम गया। कितना कुछ सोचा था उन्होंने, जो वो उस साधु से कहना चाहते थे, पूछना चाहते थे। लेकिन अभी उनके शरीर और दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया था।

"जय त्रिकालदर्शी" खपड़िया बाबा ने एक ज़ोर का हुंकारा भरा, और फिर मामा जी की तरफ़ मुड़कर बोले, "पूछ, क्या पूछना है।"

मेरे मामा जी डरपोक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि मैंने खुद उन्हें एक साथ कई लोगों से अकेले भिड़ते देखा है। एक बार 3 ग़ुस्साए बड़े बड़े कटखने बंदरों से वो ख़ाली हाथ उलझ गए थे। पर उस रात, मामा जी के मुंह से कुछ ना निकला। 

खपड़िया बाबा ज़ोर से हंसे, "क्या रे, निकल गयी सारी भक्ति तेरी? अरे पूछ ना मूर्ख।" पर मामा जी के मुंह से उस रात शब्द नहीं फूटे।

लेकिन, वो साधु, अपने आह्वाहन को बेकर नहीं जाने देने वाला था। वो मामा जी को घूरता रहा, और फिर उसके होंठ हिले। मामा जी ने देखा की कैसे उसके मुंह के अंदर के अधिकतर दांत अभी भी सलामत थे। उस साधु के सर ने केवल एक शब्द बोला -

'रजिंदर'

मामा जी बेहोश हो गए।


अगली सुबह मामा जी को होश आया और उन्होंने खपड़िया बाबा से और कोई बात नहीं की। उन्हें प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया और वहाँ से निकल गए।

"रजिंदर? ये कौन है? और इसका क्या मतलब था, मामा?" मेरे मुंह से एक साथ कई सवाल निकले।

"बताऊँ तुझे अभी सब।" मेरी मम्मी चीखीं, "चल जा के पढ़ाई कर।"

मैंने ज़िद करके जानने की कोशिश की, लेकिन मम्मी ने मेरी एक ना चलने दी। मैं उठकर वहाँ से चला गया। अगली सुबह जब सोकर उठा तो मामा जी जा चुके थे। मैंने दीदी से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया की रजिंदर उस आदमी का नाम है, जो मामा जी का दोस्त हुआ करता था। "हुआ करता था?" मैंने पूछा।

दीदी ने जवाब देने से पहले इधर उधर देखा, "अरे पागल, मामा उनकी बहन को पसंद करते थे, पर रजिंदर अंकल को जब पता चला तो उनकी और मामा की लड़ाई हो गयी, और फिर एक रात --"

"मीनू, कहाँ है तू?" मम्मी की ज़ोर की आवाज़ ने दीदी की कहानी को बीच में ही रोक दिया। दीदी उठकर जाने लगी तो मैंने रोका, "पूरी बात तो बता जा।"

"तुझे पता है फिर क्या हुआ? उसी के बाद में तो मामा साधु बन गए।" दीदी जाते जाते बोली। और तब मुझे याद आया, कि मामा जी के साधु बनने से पहले एक काफ़ी बड़ा कांड हुआ था।

मामा के चक्कर में किसी लड़की ने ज़हर खा लिया था, और फिर ग़ुस्से में आकर मामा जी ने उसके भाई को मार दिया था। हालाँकि मामा जी हमेशा सबसे यही कहते कि उन्होंने किसी को नहीं मारा है, लेकिन कोई उनकी बात पर भरोसा नहीं करता था। उसके बाद मामा जी पुलिस से बचने के लिए साधु बनकर जगह जगह घूमने लगे। 

तो क्या इसका मतलब उस साधु की खोपड़ी को पता था कि मामा जी ने अपने दोस्त रजिंदर को मार दिया था? 20 साल बाद भी मेरा बाल मन आज तक इस सवाल का जवाब ढूँढता है।

हम सब अब गांव छोड़ कर दिल्ली आ बसे हैं, केवल एक मामा जी ही हैं, जो अब गांव वाले पुराने घर में रहते हैं। वो अब साधु नहीं हैं, बल्कि एक वैध बन गए हैं। खुद ही आयुर्वेदिक दवाएँ बना कर लोगों को बेचते हैं, और गाँव के बाहर एक नए खुले मार्केट में एक दुकान लेकर औषधालय भी बना लिया है। 

उनसे मिलने, या बात करने हमारे घर से कोई नहीं जाता। मम्मी भी नहीं। 

पर एक सुबह मेरा फ़ोन बजा, गाँव से हमारे पड़ोसी का था। उन्होंने बताया कि हमारे मामा जी का निधन हो गया है। शाम को मार्केट का ही को व्यक्ति जब उनके औषधालय पहुँचा, तो वहाँ मामा जी अपने बिस्तर पर सोए मिले। 

हम सब गाँव पहुंचे और मामा जी का विधिवत अंतिम संस्कार करके वापस दिल्ली लौट आए। 

लेकिन असली कहानी इसके दो दिन बाद शुरू हुई, जब एक रात 3 बजे मेरा फ़ोन बजा। ये फ़ोन मेरी दीदी का था।

"दीदी, सब ठीक तो है?" मैंने घबराते हुए पूछा।
"तुझे रजिंदर याद है?" दीदी की आवाज़ आयी।

थोड़ी देर तक तो मुझे समझ नहीं आया कि कौन रजिंदर, पर फिर बचपन की वो शाम एकदम से मेरे ज़हन में ताज़ा हो गयी।

"क्या हुआ दीदी?"

"मौली को अभी एक डरावना सपना आया।" दीदी ने अपनी 5 साल की बेटी के बारे में बताया, "मैंने उस से पूछा क्या हुआ तो वो बोली, सपने में बाबा नाना आए थे।"

फ़ोन मेरे हाथ से गिरते गिरते बचा। मौली, हमारे मामा जी को बाबा नाना बोलती थी। उसकी भाषा में बाबा का मतलब साधु होता था। दीदी अक्सर उसे मामा जी की फ़ोटो दिखाकर डराया करती थी, कि अगर वो मम्मी की बात नहीं मानेगी, तो बाबा नाना आकर उसे ले जाएँगे।

"उसके सपने में मामा जी आए थे," दीदी ने आगे बताना शुरू किया, "और वो मौली को कह रहे थे, कि वो हम सब को बता दे।"

"क्या?" 

"रजिंदर ज़िंदा है।"

"क्या??"

"मामा जी ने मौली को सपने में आकर बोला कि रजिंदर ने ही उन्हें ज़हर देकर मार दिया। वो अपनी बहन की मौत का बदला ले रहा था।"

मौली को रजिंदर, उसकी बहन और मामा जी के बारे में कुछ नहीं पता था, बल्कि उसने अभी कुछ महीने पहले ही सही से बोलना शुरू किया था।

उस त्रिकालदर्शी साधु की खोपड़ी ने उस रात जो देखा था, वो मामा जी, दीदी और मुझे अब जाकर समझ आया था। पर तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी।

कुछ दिन बाद, रजिंदर नाम का एक आदमी, एक और क़त्ल के सिलसिले में हापुड़ के पास पकड़ा गया। वहां उसने अपने कई कुकृत्यों के साथ मेरे मामा जी को ज़हर देने की बात भी क़बूली। 

(समाप्त)




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