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सिलाई मशीन (SILAAI MACHINE) HINDI HORROR STORY

“ दीदी मैं बहुत मुसीबत में हूँ। मेरी सिलाई मशीन पता नहीं कहाँ चली गयी है। उसके बिना मैं काम कैसे करूँगा दीदी ? मेरी सिलाई मशीन ढूँढवा दो दीदी। ” राकेश रेणु के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

बंधे हाथ (Bandhe Haath) HINDI HORROR STORY


 

 

 

 

आज से क़रीब 15 साल पहले आयी IT सेक्टर की बारिश के दौरान, 

नॉएडा  में ना जाने कितनी ही छोटे छोटे मॉल, कुकुरमुत्तों की तरह निकल आए थे। 

 

इनमें से ज़्यादातर मॉल आज भी चल रहे हैं, लेकिन सेक्टर 32 में बने एक मॉल की क़िस्मत इतनी अच्छी नहीं थी।

और मॉल की इस बदक़िस्मती का रिश्ता  शायद उस ज़मीन से जुड़ा हुआ था, जिस पर ये मॉल खड़ा है।

 

ये कहानी तब की है, जब ये मॉल नया नया शुरू ही हुआ था। नॉएडा के इस हिस्से में तब ज़्यादा आवा-जाही नहीं होती थी, 

और इसीलिए ये मॉल भी ज़्यादातर ख़ाली रहता था। ऐसी ही एक रात की बात है, जब इस मॉल का बूढ़ा सिक्योरिटी गार्ड रात के क़रीब 11 बजे, 

मॉल के अंदर एक आख़िरी चक्कर लगा कर ये पक्का कर रहा था की मॉल के अंदर अब कोई भी नहीं था। 

कुछ एक दुकानों के ताले देख कर तसल्ली करने के बाद वो गार्ड मॉल के बाहर निकल आया, 

और उसका बड़ा सा काँच का बना दरवाज़ा बंद करने लगा।

 

और तब उस बूढ़े की नज़र ने देखा -

 

ठीक सामने, मॉल की लॉबी में लगी लिफ़्ट का बटन जगमगाया।

 

ख़ाली पड़े मॉल में रात में इस तरह लिफ़्ट के बटन का जलना वाक़ई में हैरानी वाली बात थी,

लेकिन गार्ड ने सोचा कि शायद कोई तकनीकी ख़राबी हो।

 

फिर भी, गार्ड ध्यान से लिफ़्ट को देखता रहा, जो ऊपर के फ़्लोर से नीचे आ रही थी।

मॉल के अंधेरे में, लिफ़्ट की हल्की रोशनी पिघल कर बहती हुई बाहर निकली,

और गार्ड ने देखा, की लिफ़्ट के अंदर खड़ी थी - एक लड़की।

 

उसकी उम्र यही कोई 18-19 साल रही होगी।

लड़की ने पुराने से डिज़ाइन का सलवार सूट पहन रखा था, और पता नहीं क्यूं

पर उसके हाथ पैरों और बदन पर -- कीचड़ लगा हुआ था।

 

उस लड़की को देख कर गार्ड के दिमाग़ में, सबसे पहली बात आयी,

"मॉल के अंदर कोई रह गया है।"

 

काँच के दरवाज़े को खोल कर वो गार्ड ज़ोर से बोलता हुआ लिफ़्ट की तरफ़ भागा।

"मैडम कौन हो आप?"

 

लड़की, चुपचाप एकटक गार्ड को देखती रही, और लिफ़्ट में किसी मूर्ति की तरह खड़ी रही।

और जब तक गार्ड वहाँ पहुँचा, लिफ़्ट पूरी तरह बंद हो चुकी थी।

 

पर गार्ड ने तुरंत लिफ़्ट के बटन को दबाया, और लगभग दो सेकंड्स के बाद लिफ़्ट के दरवाज़े फिर से खुल गए।

लेकिन इस बार, लिफ़्ट के अंदर - कोई नहीं था।

 

ये समझने में, की उसने अभी अभी क्या देखा है, गार्ड को शायद 5 या 10 सेकंड्स लगे।

लेकिन जैसे ही उसके दिमाग़ ने 2 और 2 चार किए, वो भाग कर

मॉल से बाहर आकर खड़ा हो गया।

 

काँच के दरवाज़े को फिर से बंद करके वो उस लिफ़्ट को देखने लगा,

जो अब नीचे से ऊपर जा रही थी। गार्ड ने देखा, की लिफ़्ट फ़र्स्ट फ़्लोर पर रुकी।

 

और इस बार, वही लड़की लिफ़्ट के अंदर खड़ी, गार्ड को ही घूर रही थी।

 

गार्ड के ही सामने वो लड़की धीरे से लिफ़्ट के बाहर चल कर आयी,

और बाएँ मुड़कर मॉल के अंधेरे में कहीं घुल कर ग़ायब हो गयी।

 

★☆★

 

राजू गुप्ता की उसी मॉल में एक छोटी सी गिफ़्ट शॉप थी।

फ़रवरी का महीना था, और वैलेंटाइंस वीक के चलते उसकी दुकानदारी उन दिनों,

थोड़ी ज़्यादा ही हो रही थी। तो उस रात राजू को पता ही नहीं चला कि कब रात के 10:30 बज गए।

 

ध्यान आने पर उसने दुकान पर ताला लगाया और लिफ़्ट से ग्राउंड फ़्लोर पर पहुँच गया।

वो लिफ़्ट से बाहर निकला और मॉल के मेन डोर की ओर जाने लगा, की तभी -

 

उसे पीछे से एक आवाज़ सुनायी दी। 

एक लड़की की आवाज़।

 

"सुनिए"

 

राजू ने पलट कर देखा, तो लिफ़्ट के अंदर एक लड़की खड़ी उसी को देख रही थी।

उमर रही कोई 18-19, पुराने डिज़ाइन का सलवार सूट, और बदन और कपड़ों पर - कीचड़।

 

राजू कुछ पल उस लड़की को देखता रहा। 

उसे अच्छी तरह से याद था कि वो लिफ़्ट में अकेला ही आया था। फिर अचानक,

ये लड़की लिफ़्ट में कहाँ से आ गयी?

 

तभी उस लड़की की आवाज़ ने राजू का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा।

वो बोली,

 

"वो लोग आ रहे होंगे, मेरे हाथ खोल दीजिए।"

 

ये कहकर उस लड़की ने अपने दोनों हाथ, राजू की तरफ़ बढ़ा दिए।

राजू ने देखा, उस लड़की के दोनों हाथ एक दुपट्टे से बंधे हुए थे, जो शायद उसकी के सलवार सूट का था।

 

राजू का दिमाग़ एक साथ कई सारे सवालों से गूंज उठा।

"कौन है ये लड़की, इस वक्त मॉल में क्या कर रही है? और इसके हाथ--"

 

तभी लड़की की मिन्नतों ने फिर से राजू के ध्यान की पतंग को खींचा।

 

"जल्दी कीजिए, वो लोग आते ही होंगे।"

 

मदद करने के इरादे ने राजू के पैरों को ताक़त दी, और वो उस लड़की की तरफ़ चल पड़े।

लेकिन तभी राजू की नज़र, उस लड़की के पैरों पर गयी। उसने देखा -

 

उस लड़की के पैर, खुले हुए थे। 

 

राजू के सर में उमड़ रहे सभी सवाल एकदम से शांत हो गए, और उनकी जगह नए सवालों ने ले ली।

"अगर इस लड़की के पैर खुले हुए हैं तो ये भाग क्यूं नहीं जाती?"

 

किसी मूर्ति की तरह खड़ा राजू, इन्हीं सवालों के जवाब खुद से ही लेने की जुगत में लगा हुआ था की तभी,

उस लड़की ने एक बार और आवाज़ दी -

 

"जल्दी कीजिए, मेरे हाथ खोल दीजिए"

 

पर इस बार राजू आगे नहीं बढ़ा।

अपनी जगह खड़ा हुआ वो बोला, 

 

"आप यहाँ आ जाइए, मैं खोल दूँगा।"

 

अचानक, लड़की का रोना और गिड़गिड़ाना बंद हो गया। 

और वो चुपचाप अपनी बड़ी बड़ी आँखों से राजू को घूरने लगी।

 

लड़की की नज़र ने मानो राजू की हड्डियों को पानी बना दिया था।

और तब उस लड़की के मुंह से एक अलग ही आवाज़ निकली।

 ये आवाज़ किसी बेचारी लड़की की नहीं, बल्कि किसी भूखे शेर की दहाड़ जैसी थी।

 

एक भारी और घरघराती आवाज़ में लड़की चीखी,

 

"खोल दे"

 

इस आवाज़ ने राजू की हड्डियों को बर्फ़ कर दिया।

राजू पलटा, और सीधा मॉल के काँच वाले दरवाज़े की तरफ़ भागा।

वो सुन पा रहा था, कि उसके पीछे मॉल के फ़र्श पर नंगे पैरों के गिरने की आवाज़ आ रही थी।

वो समझ गया था की वही लड़की उसके पीछे भाग रही थी।

 

अपने फेफड़ों की सारी हवा समेट कर राजू, मॉल के दरवाज़े पर पहुँचा और एक आख़िर बार

उसने पीछे देखने की हिम्मत की।

 

वो लड़की लिफ़्ट के अंदर ही खड़ी थी।

 

पीछे देखने के चक्कर में राजू मॉल की एंट्री की सीढ़ियों को नहीं देख पाया।

उसका पैर उलझा और सीढ़ियों से गिरता पड़ता, मुंह के बल ज़मीन पर जा गिरा।

 

अब डर के साथ, दर्द भी राजू पर हावी होने लगा।

उसकी नाक और मुंह से खून की नालियाँ बहने लगीं।

और इतने में ही, दो हाथों ने उसे पीछे से पकड़ लिया।

 

चीखता हुआ, राजू पीछे पलटा, और उसने देखा, की उसे पकड़ने वाले हाथ,

उस लड़की के नहीं, बल्कि मॉल के गार्ड के थे। 

 

गार्ड, मानो राजू की आँखों में तैर रहे उस ख़ौफ़ को किसी किताब की तरह पढ़ पा रहा था।

उसने राजू को कुर्सी पर बिठाया, खून साफ़ करके उसे पानी पिलाते हुए उसने राजू से पूछा,

 

"आपने भी उसे देखा?"

 

राजू की गर्दन ऊपर उठी और उसने गार्ड को देखा।

 

"आप डरो नहीं,  वो लड़की मॉल के बाहर नहीं आती। बस अंदर ही घूमती है।" 

गार्ड ने अपनी बात पूरी की।

 

"आप जानते हो वो कौन है?" राजू की आवाज़ वापस आयी।
 
चेहरे पर शांति के सफ़ेद बादल समेटे गार्ड ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया,   
"नहीं सर, हम नहीं जानते उसे। लेकिन एक बात जानते हैं।"
ये कहकर गार्ड ने चारों तरफ़ देख कर कहा, "ये जगह देख रहे हैं आप? जिस ज़मीन पर ये मॉल खड़ा है।"
 
"एक वक्त था जब यहाँ सिर्फ़ खेत हुआ करते थे। जहां तक आपकी नज़र जाए वहाँ तक सिर्फ़ खेत ही खेत हुआ करते थे। 
और सर, खेती के अलावा एक और चीज़ खेतों में होती है -- जुर्म।
 
खेतों में काफ़ी ग़लत काम भी होते हैं सर।
खून, ज़बरदस्ती, या फिर किसी को ग़ायब करना। 
बड़े काम की जगह हैं ये खेत।"
 
राजू, अपने दोनों हाथ बांधे, टकटकी लगाए, गार्ड की तरफ़ देख रहा था।

"लोग मुझसे पूछते हैं उस लड़की के बारे में सर," गार्ड बोलता रहा, 
"पूछते हैं ये कैसा भूत है जो एक मॉल के अंदर रहता है?"

गार्ड हल्का सा हंसा और बोला,
 
"मैं उन्हें बताता हूँ, कि भूत मॉल के अंदर नहीं है सर।
बल्कि हमने भूत के घर के ऊपर मॉल बना दिया है।"
 
"हो सकता है, इन्हीं खेतों में उस लड़की के साथ कुछ बहुत बुरा हुआ हो।
और इसीलिए ये आज भी यहीं है।" 

थोड़ी देर के लिए वहाँ सन्नाटा छाया रहा,
और तब राजू ने गार्ड से पूछा,
 
"अंकल, अगर कोई उस लड़की के हाथ खोल दे तो?"
 
इस बार गार्ड थोड़ी ज़ोर से हंसा। राजू को ये बात काफ़ी अजीब लगी।
हंसने के बाद, गार्ड ने साँस ली, और फिर राजू की तरफ़ मुस्कुरा कर बोला,
 
"बड़ा नेक ख़याल है सर आपका।
लड़की को मुक्ति दिलाना चाहते हैं आप।"

राजू को थोड़ी देर के लिए अच्छा लगा, लेकिन तब गार्ड ने एक सवाल उसी के ऊपर दागा,

"आप खोलेंगे उस लड़की के हाथ?"

फ़रवरी की उस ठंड रात में उस सवाल ने राजू के जिस्म में एक और सिहरन का इज़ाफ़ा कर दिया। 
उसने देखा गार्ड उसी की तरफ़ देख रहा था। वो बोला,

"बताइए सर, आप खोलेंगे उसके हाथ?"
 
(समाप्त)
 
 
 
BANDHE HAATH HINDI HORROR STORY

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